इतना चाहती हूँ

इतना चाहती हूँ
इतना ना इतराया करो,बेरूखी में, ना दिन जाया करो
यूँ दूर ना मुझसे रहो,बुलाने से पहले आ जाया करो
क्यू खामोश हो या खुद में ही मदहोश हो
चुप हो ऐसे तुम जैसे मुझमें ही कोई दोष
यूँ ना रहो, खुलकर जो भी हो, बताया करो
इतना ना इतराया——
दिन हो या रात खुद में मशगूल हो
समय पे काम देने को सबमें मशहूर हो
मेरी भी पीङा ,यूँ ना मेरी बढाया करो
इतना ना इतराया——–
कभी-कभी मेरे किए गए कामों की
मेरे कपङो,मेरी कहीं गयी बातों की
मेरी,मेरी रचनाओ की अच्छाई बताया करो
इतना ना इतराया——-
नुक्श मुझमें निकाला करते हो रोजाना
दाल गाढ़ी नमक कम,कह कर देते हो बेगाना
कभी फीकी चाय को भी मीठा बताया करो
इतना ना इतराया———
सबमें अच्छाइया ढूंढा करते हो अकसर
तरफदारी करते हो उनकी चाहे आए हो थककर
कभी मेरी खामियां मुझसे भी मुझसे छिपाया करो
इतना ना इतराया———–
ख्याल रखते हो, घर में क्या है क्या नहीं
पूछते हो सबकी कौन आया, कौन आया नहीं
कभी मेरी इच्छाओं को भी समझ जाया करो
इतना ना इतराया————
हर बात को कहाँ कब कैसे बताया करूँ
अपने दर्द को,बता दो, कैसे छिपाया करूँ
कभी बताने से पहले खुद ही समझ जाया करो
इतना ना इतराया———

Comments

6 responses to “इतना चाहती हूँ”

  1. Satish Pandey

    सुन्दर पंक्तियाँ,

  2. Suman Kumari

    धन्यवाद

  3. ( , ) के बाद एक डैश के बाद कुछ लिखना चाहिये।क्यूँ खामोश

  4. कवियत्री ने अपने ह्रदय के भाव को समझ के रखा है

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