जय श्री राम
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इतना भी कोई गिरा न होता
मन पाप करता, मन डरता
इसका मतलब ये नहीं कि
नर नारायण ना होता ।।1।।
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माया तो मायापति की अर्ध्दांगनी है
मन भी ईश्वर का स्वरूप है
मन को मन ही साधता है
तब जाके कोई भवसागर पार होता है ।।2।।
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कोई गिरा-उठा है या कोई उठा-गिरा है
ये सब मायापति की महिमा है
वोही सब खेल रचते है
वोही जीतते हारत है ।।3।।
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दुनिया की रंगमंच में सब पाठ अदा करते है
ईश्वर भी कभी-कभी, हर युगों में
धर्म-संस्थापना के लिए नर रूप में आते हैं
इतना भी कोई गिरा न होता ।।4।।
कवि विकास कुमार
इतना भी कोई गिरा न होता
Comments
One response to “इतना भी कोई गिरा न होता”
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बहुत खूब
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