इम्तहान

भोग विलास के लिबास पहनकर
कब तक खुद से प्यार करोगे
काम क्रोध ईर्ष्या को त्यागो
जीवन का भव पार करोगे
माया मोह के इम्तहान में
जब तक सफल ना होगे तुम
लोगों के दिल में बस न सकोगे
खुद की नजर से रहोगे गुम
जब तक जीवन की गाथा का
कोई सार नहीं मिल जाता है
तब तक प्यार के सागर में
कोई गोता कैसे लगाता है।
जन्म मरण अच्छा बुरा
ये सब जीवन की रचना है
हमको तो बस इम्तिहान में
इन सभी से ही तो बचना है।
वीरेंद्र सेन प्रयागराज

Comments

2 responses to “इम्तहान”

  1. Geeta kumari

    सुन्दर अभिव्यक्ति

  2. अति, अतिसुंदर भाव

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