ढूंढता है तू जिसको
सागर की गहराइयों में
वह तो छिपा है खुद
तुम्हारी ही परछाइयों में ।
क्यों दर-दर की ठोकरें खाता है
उसे पाने के लिए
समझना है तो समझो खुद को
जमाने के लिए ।
ना प्रयाग में मिलेगा
ना हरिद्वार में मिलेगा
मन की आंखों से निहारो
जीवन के तार तार में मिलेगा ।
वीरेंद्र
ईश्वर की खोज
Comments
5 responses to “ईश्वर की खोज”
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सुंदर भाव
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बहुत खूब
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वाह
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वाह
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👏👏
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