उदासी

        उदासी   

मधुमक्खी के छत्ते सा है

ये ज़हान ,

यहां सब, मतलब से

झांकने वाले हैं।

अब किसे मैं यहां अपना कहूं,

यहां सब काटने वाले हैं ।

मां को छोड़कर,

सब लोभी है, ढोंगी है,

फरेबी है ।

जरा संभल कर  ‘ मानुष ‘

यहां सब पीछे से झपटने वाले हैं।

——–मोहन सिंह मानुष

Comments

5 responses to “उदासी”

  1. Vasundra singh Avatar
    Vasundra singh

    सुन्दर रचना

  2. सुन्दर रचना

  3. यथार्थ चित्रण मधुमक्खी के छत्ते से तुलना करके आपने नई उपमा दी है

  4. Pratima chaudhary

    बहुत ही लाजवाब

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