मोहन सिंह मानुष's Posts

आलसियों के महाराज (बाल कविता)

भिन-भिन करती, मक्खियां आई! भी-भी करते, मच्छर लाई! गोलू बड़े ही मस्त मौला, जिन्न को झट से आवाज लगाई, मुस्कुराकर जिन गोलू से बोला, चैन से सोएं मेरे साईं, मच्छरदानी! अभी लगाई। भी -भी ,भिन-भिन, मच्छर कांटे! गिन -गिन , गिन -गिन, सपनों की गहराइयों से, गोलू ने फिर की लड़ाई। ओ रे मच्छर! तुझको जरा-सी शर्म ना आई, तुझे ना आती, मुझे तो आती, नींदें मेरी बड़ी सुहानी, तुमने नालायक क्यों भगाई। ऊपर से ये मच्छरदानी... »

दोस्त

अगर खुदा तुमने , लाखों तकलीफें दी हैं; मानुष को! तो कोहिनूर से दोस्त भी दिए हैं, उनकी मोजुदगी ही है, जो मुझे आस्तिक बनाती है। »

मैं भी चौकीदार!

इश्क़ ने हमें बर्बाद किया; फिर भी दिल ने; खुद को आबाद किया।-२ अरे! ना आती है , तो ना आए ! नींदें रात को, मैं भी चौकीदार ! गर्व से! मोदी जी को याद किया। »

तेरा मेरे लिए होना

तेरा मेरे लिए होना, उतना जरूरी, जितना जरूरी , ज़हान को हवा पानी है, तू अंजाम है, मेरे इश्क का , तू सुकून है , मेरी बैचेनी का, कम शब्द में कहुं तो दिल की हसरतें, तेरी दीवानी है सांसों के बिना, कोई कैसे रहे तू मेरे हाले-दिल की, कहानी है तेरा मेरे लिए होना उतना जरूरी जितना जरूरी ज़हान को हवा पानी है हंसी हो, खुशी हो, गम हो या दर्द की झड़ी हो वक्त की बदहाली में भी , तेरी मौजूदगी से , मौज-ए-रवानी है ते... »

वह हिंदुस्तान ही हैं!

जहां बेटियों को पूजा जाता है वह हिंदुस्तान ही है, और जहां पर इज्जत को सरेआम, नीलाम किया जाता है , वह भी हिंदुस्तान ही है। जहां बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ! की मुहिम फैलाई जाती है, वो भी हिंदुस्तान ही है और जहां बेटियों के इंसाफ हेतु राजनीति खेली जाए, वह भी हिंदुस्तान ही है। »

अब के दशहरे

चलो ! अब के दशहरे , नया कोई चलन करते हैं। भला कब तक जलाते रहें, लकड़ी का रावण, मन में जो बैठा है, उसी का आज दहन करते हैं, चलो अब के दशहरे ! नया कोई चलन करते हैं। »

बीती सुध

बीती सुध ,जो कभी सुखदायक थी , आज वो बड़ा रुलाती हैं, चार दिन की घनी हरियाली थी, अब पतझड़ बड़ा सताती है। »

दर्द का जो स्वाद है

दर्द का जो स्वाद है, उससे दिल आबाद है, मुफ्त है जग में, खुदगर्जीया ! मक्कारियां सरेआम है, दर्द का जो स्वाद है, उससे दिल आबाद है। मदहोशियों का माहौल हैं बहरूपियों की यहां फौज हैं, पराया यहां, किस -किस को कहें, अपनों की जरा खोज है, बैचेनियां, तन्हाईयां, बदनामियां! आजाद हैं, दर्द का जो स्वाद है, उससे दिल आबाद है। »

वे सो रहे हैं

वे सो रहे हैं व्यवस्था को, जेब में लेकर, हम रो रहे हैं , हाथ में मोमबत्तियां लेकर! वे जागते हैं अक़्सर चुनाव में, और हम हादसों में …. »

मैं जब-जब अकेला होता हूं

मैं जब-जब अकेला होता हूं, दर्द के संताप को, बाहों में लेकर रोता हूं। खो जाता हूं ,उन यादों में, उलझे हुए उन ख्वाबों में, वक्त की जबरई को, गले लगाकर; खोता हूं, जब-जब अकेला होता हूं। कभी अपना ही, कभी औरों का , गम देखकर, मैं हैरान-सा नींदों को भगाए रहता हूं, जब जब अकेला होता हूं। »

मुझे सोने नहीं देती

मैं अक्सर आंखें मूंद लेता हूं, चैन से सोने के लिए, मगर मक्कारी; बीमारी जमाने की; मुझे सोने नहीं देती! »

मेरी हिंदी,मेरा अभिमान!

मेरी भावनाओं में; जो उत्तथ-पुथल है , उनको शांत ! वो आराम से कर सकती है, माना बहुत सारी है, भाषाएं इस संसार में, मगर मेरी आत्मा को तृप्त! मेरी हिंदी ही कर सकती है। हिंदी दिवस की सबको हार्दिक शुभकामनाएं। 🙏🙏मोहन सिंह मानुष »

वो चली गई!

वो रात भर खांसती! चिल्लाती! घबराती! फड़फड़ाती! भुखी-प्यासी, आंसू बहाती, अकेली तड़पती, चलीं गईं! छोड़ सांस , वो चली गई। मगर बेटे बड़े संस्कारी! ऐसे ना भुखा जाने देंगे, जीते जी तो कुछ कर ना पाए , मगर आज पूरा ध्यान देंगे, जिसके लिए कितना तरसी वो, पूरा वो मान देंगे, पूरा वो सम्मान देंगे! »

हसरत ए दीदार

बहुत झगड़े हम रात भर दिल से अपने , मगर बदनामी करे, मनमानी करे, दिल मेरा , तुम्हारी ही गुलामी करें , आखिर आना ही पड़ा लौटकर , तेरे शहर में, तेरी गलियों में, हसरत ए दीदार को तेरे , दिल मेरा बदनामी करे, दिल मेरा मनमानी करें। »

फर्क तो जरूर मिलता है।

तू शक्तिशाली!,मैं दलित ! तू स्वर्ण ! मैं नीच! यह शब्द स्वार्थ में , तूने ही मुझे दिए। तू मालिक, मैं दास, तेरी विचारधारा में; मेरा उपहास, शोषण का खाता, यहां हर रोज खुलता है, अरे!कितना भी अनदेखा करो, फर्क तो जरूर मिलता है। जरा-सा खून का कतरा निकाल, मेरा और अपना, फिर देख! मिला , मेरे वजूद के साथ अपना वजूद, फर्क मिलेगा! मगर नस्ल का नहीं , ना ही रूप का , हां! तेरी सोच के बीज का, उच्च-नीच के बीच का, भेद... »

नादान पौधा

नन्ना-सा ,एक छोटा-सा , टहनी बड़ी, मगर कोमल-सा, अकेला मनोहर पौधा, तेज हवाओं में ,वो झूला झूले, कभी इधर कभी उधर, क्रीडा ललाम बड़ी सुहावनी, बारिश में वो नृत्य करें, मगर माली ठहरा क्रुर-सा, पौधा उसे नापसंद करें, बांध दिया उसने उसको, मोटी-सी एक डंडी से, हो गया बेचारा कैदी-सा, पकड़ा-सा कोई भेदी-सा, कैसे हवाओं में वो झूमे, कैसे धरती को वो चूमे , पल-पल पुरानी यादें, मन में एक विद्रोह करें, मगर बड़ा हुआ जब... »

आओ ताली बजाते हैं!

आओ थाली बजाते हैं! गरीबी का मुंह दिखाने वाली, बेरोजगारी के लिए , आओ ताली बजाते हैं! देश की कमर तोड़ने वाली मरी हुई अर्थव्यवस्था के लिए, आओ थाली बजाते हैं! झूठ को सच बनाने वाली दलाल मीडिया के लिए , आओ ताली बजाते हैं! »

मैं शिक्षक हूं वर्तमान का!

मैं शिक्षक हूं वर्तमान का, मुझे बच्चों से डर लगता है, मजबूर-सा हूं पढ़ाने में, बेरोजगारी से डर लगता है। सम्मान-वम्मान जुति बराबर मगर लाचारी से डर लगता है, अध्यापन ही एक काम नहीं अतिरिक्त कार्य बहुत से होते है, मालिक बड़े ही प्रताड़ित करते, सैलरी रुकने से डर लगता है। क़तरा-क़तरा ख़ून निचोड़े फिर जेब से पैसा निकलता है, ना पढ़ाएं तो खानें के लाले, भूखमारी से डर लगता है। गुरु है , गोविंद समान , कहने क... »

दिखावे के पीछे -पीछे

दिखावे का मायाजाल बड़ा भयंकर, जो फंस जाएं निकल ना पाए, फिर उचित ,अनुचित सब परे-सा, अलग-अलग हाथी के दन्तों -सा। »

हां मान लेता हूं…

हां मान लेता हूं , अब नहीं होता ,पहले जैसा, बार-बार वो इजहार करना , मगर मैं उस कस्तूरी-सा जो कपड़ा फट जाए , मगर खुशबू नहीं छोड़े। »

मेरा वजूद

वो मेरा बहुत ख्याल रखता , मुझे भले-बुरे की पहचान कराता, जब भी संकट आता ,मुझे बचाता, मगर उससे ज्यादा , मैंने दूसरों से प्यार किया, पर,जब सबने ठुकराया, उसी ने मेरा हौसला बढ़ाया, बस इसीलिए बहुत प्यारा है, मुझे मेरा वजूद। »

हमें औरों-सा ना समझ…

हमें औरों सा ना समझ, आंखों से और बातों से, इरादों को भांप लेते हैं। ये झाड़ पर चढ़ाना, मीठी-मीठी बातें बनाना, यहां नहीं चलेगा, हम स्वार्थ की चाह को, दिमाग़ से अपने; थोड़ा जांच लेते हैं। »

मेरा रक़ीब

मेरा दिल ही मेरा रक़ीब है, मैं भुलना चाहता हूं, उसे और ये याद करता रहता है। »

तुम जाओगे…

तुम जाओगे ,कल नहीं; आज चलें जाओ, छोड़ जाओ, रोकूंगा नहीं, मगर काम ज़रा-सा करके जाओ, फिर कभी टोकूंगा नहीं। ये यादें जो घर बनाएं बैंठी है दिल में, ज़रा मेहरबानी ! ले जाओ, फिर कभी भी; ईमान से, कोसूंगा नहीं। »

बेबसी का सैलाब

बेबसी का सैलाब कुछ ऐसा आया , सब रिश्तों को बहा ले गया, तंगी कुछ ऐसी हुई कि, हर कोई हमसे; तंग-सा हो गया, और जनाब!कोरोना तो वैसे ही; हैं बदनाम ;आजकल कोरोना से बुरा तो , हमारा वजूद हो गया। »

तुम्हें नहीं मालूम…

तुम्हें नहीं मालूम , मगर मंसूबों को तेरे , मैं जान लेता हूं, रहता हूं परेशान, मगर; फिर भी खुद को हर हाल में , संभाल लेता हूं, और इत्तेफाक से तुम्हारी आंखों और लफ्जों का तालमेल, बिगड़-सा गया है आजकल , बस !इन्हीं हरकतों से , तुम्हें पहचान लेता हूं, इन्हीं हरकतों से , तुम्हें पहचान लेता हूं। »

प्रेम विरह

प्रेम विरह क्या सही है ,क्या गलत , ना जानू । पर आंखें  टपक- टपक नयन-जल बौछार में ; भीगा तनबदन, क्या करूं? क्या ना करूं ? ना जानू। नाराज़ हूं ;मैं खुद से पर क्यो वो नाराज़ हैं ? ग़लत मैं थी या वो ? ना जानू । पर क्यों ना रह पाऊ? क्यों ना कह पाऊं? हर दूख , हर पीड़ा सह जाऊं, क्रोध को उनके, जफ़ा  को उनकी पानी-सा समझ पी जाऊं पर कैसे मनाऊं उनको ? ना जानू। एक कक्ष में दो परिंदे , कैसे ?कब से ? हम हो गए ना... »

मुझे समझने की कोशिश मत करना

मुझे समझने की कोशिश मत करना, मैं उलझा-सा कोई जाल हूं, जितना सुलझाओंगे , उतना ही उलझ जाओगे अगर सुलझा लिया तो, फिर खुद को ही भूल जाओगे। »

तुच्छ राजनीति

ये राजनीति बड़ा ही मीठा जहर, मानवता पर बड़ा ढहाती कहर , होते दंगे ,बिखर जाती लाशें, फिर मिडिया हमारी, दिखाती दलाली, हाए! हिन्दू मर गया , हाए! मुस्लिम मर गया, पर कौन बताए? और कौन समझाए ? केवल इंसान मरता है, तुम्हारे तुच्छ मंसूबों से, केवल इंसान मर गया, हां ,इंसान मर गया। »

पापा की लाडली

निकल ही गई ,जान मेरी! जब नन्हीं-सी जान , पहली बार बीमार हुई। औरों को भी थी गमी, पर आंखों से मेरी, बेमौसम बरसात हुई, नहीं था होश, मुझे ना जाने , कितनी बैचैनियो की बाढ़ हुई। भागा मैं उसे लिए गोद में , पल पल मन में घबराहट हुई फिर से वो मुस्कुराए, जल्द फूल- सा वो खिल जाएं , मन से मेरे फ़रियाद हुई। जब पहुंचा मैं अस्पताल में, डॉक्टर !डॉक्टर! हाय!चित्कार हुई। डरना तो बेकार है, बस हल्का सा बुखार है! डॉक्ट... »

चश्मे वाले नेताजी!

चश्मे वाले नेताजी! गजब कमाल करते हैं, करोड़ों जनों को चुना लगाने का; जिगरा सरेआम रखते हैं , ना खाऊंगा ना खाने दूंगा! ऐसे-ऐसे वादे तो; वो खुलेआम करते हैं, चश्मे वाले नेता जी , गजब कमाल करते हैं। यह सूट बूट ; ये शानो शौकत महज़ एक औपचारिकता, असल में नेताजी! एक फकीर ठहरे! और फिर गंगा पुत्र हैं नेताजी मगर ,गंगा अभी मैली ही है, फिर भी ,भाषण कला एक अस्त्र! इसका प्रयोग नेताजी; हर बार करते हैं, चश्मे वाले ... »

माना कुछ बुराईयां…..

माना कुछ बुराईयां है मुझमें, मगर सारी अच्छाईयां नहीं है तुझमें, फर्क इतना-सा , मैं हुबहु कहता, और तू बनाकर। »

जिससे ठोकर लगी मेरी…

जिससे ठोकर लगी मेरी, एकाएक वो पत्थर बोला! माना गिरे हो तुम, मगर इतने भी नहीं गिरे हो तुम, जो गिरते ही रहोगें हरदम। »

नन्ही सी बिटिया

शैतान की नानी, बन्दर-सी शैतानी, जादू की पुड़िया, सोने की गुड़िया, परियों सी रवानी, प्रेम की निशानी, बालों को नोचे, कान को खींचे, शरारतें उसकी मन को भाएं, थकान का आलस पल मे उड़जाए, बेटी मेरी कलेजे का टुकड़ा, दिल में बसा है अब उसका मुखड़ा, आंगन की मेरे वो है शोभा, परिवार की मेरे शान बढ़ाये। »

आपके लिए तो…

आपके लिए तो केवल वो शब्द थे, जो निकल गए जुबान से, मगर जो आघात हुए हैं हृदय से, उनकी खता तो बताइए ,जनाब! »

अभागी क़िस्मत

आज तू हंस ले , खुलकर मुझ पर, मगर ,थोड़ा सा सब्र कर; अरी; सुन ! मेरी अभागी क़िस्मत! मैं सीख तुम्हें सीखलाऊंगा, मेहनत की जंजीरों से जकड़कर, मुलाजिम तुम्हें बनाऊंगा। मुलाजिम, तुम्हें बनाऊंगा! ——मोहन सिंह मानुष »

मैं…

चलो ‘मैं’ को, ‘मैं’ से लड़ाते हैं! जीतकर , फिर ‘मैं’ से ‘हम’ बनाते हैं। विशेष–> यमक अलंकार का प्रयोग एक “मैं ” अपने आप के लिए दूसरा ” मैं ” अहंकार के लिए »

एक सावन ऐसा भी (कहानी)

               किसी ने कहा है कि प्रेम की कोई जात नहीं होती, कोई मजहब नहीं होता ।मगर हर किसी की समझ में कहां आती है ये बातें। कुछ लोगों के लिए समाज में इज्जत से बड़ी कुछ चीज नहीं होती है ,मगर यह इज्जत क्या इंसानियत से भी बढ़कर होती है; यह समझना या समझाना बड़ा मुश्किल है। बात हरियाणा के एक छोटे से गांव महबूबगड़ की है । गांव के खुले आसमान और  हरियाली भरे वातावरण की छटा ही निराली होती है जो आपको कहीं... »

वजह क्या हैं

बहुत आ रहे हैं लोग ; आजकल ,पास तुम्हारे ! पहले तो नहीं आते थे , सच बताओ ये रजा क्यों है, डॉक्टर हो शायद ,स्वार्थ के! सच तो बताओ , वजह क्या हैं? »

माना शराफत भली है..…

माना शराफत भली हैं ,इंसानियत के लिए, मगर, हे मानुष ! ज्यादा युधिष्ठिर ना बन, तेरे आस-पास सुगनी बहुत रहते हैं। »

पपीहे की आस(कहानी)

पपीहे की आस जैसी खुशी बच्चे के पैदा होने पर होती हैं ,शायद उससे भी ज्यादा खुशी किसान  को बारिश होने पर होती हैं यही खुशी प्यारेलाल की आंखों में दिख रही है, आज बसंत के मौसम में इंद्र की कृपया से खेतों में मानो जान सी आ गई थी। वर्षा के साथ-साथ प्यारेलाल के मन में कल्पनाओं ने जन्म लेना शुरू कर दिया था, अबकी बार फसल अच्छी होगी तो वह सारा कर्जा उतार देगा, फिर मुनिया को ,गंठा रोटी खाने के लिए मजबूर भी न... »

कमियां हमारी

दिखाईं देता है, तुझे अपना दुःख, और तकलीफें भी, और नज़र आ जाती है, अपनी अच्छाईयां भी, मगर मानुष! तू बहुत लालची, दिखावे के लिए तुने, क्या-क्या नहीं किया, फिर दिखाई देती है, तुम्हें अपनी बेबसी। बस एक चीज , जो दिखाई नहीं देती, खोट अपना! कमियां अपनी! »

दर्द या हमदर्द

जो कभी दुश्मन था मेरा, वो आज मुझसे हमदर्दी रखता, ये मेरा दर्द ही अब मुझे , आजकल तसल्ली देता है। »

आंसू मेरे

जितना रोकूं उतना ही बहते , दर्द का किस्सा पल में कहते, आंसू मेरे बड़े ही मनमाने-से, जरा सी बात पर बहते रहते। »

रोने वाले पापा (कहानी)

                         रोने वाले पापा                                मुकुल कितना भी गुस्सा हो ,मगर जब भी वह अपनी बेटी से मिलता हमेशा खुश और जिंदादिली दिखाता । दिनभर की उसकी सारी थकान  एक ही सेकंड में फुर हो जाती थी । आजकल काम की वजह से मुकुल काफी परेशान रहने लगा था ।वहीं थोड़ी सी सैलरी और बहुत सारे खर्चे ,बिजली का बिल ,खाने का राशन ,पापा की गालियां और साध्वी की चिक चिक बाजी । ऐसी बहुत सारी बातें... »

एक दर्द, अनकहा सा (कहानी)

                एक दर्द ,अनकहा सा साल में कितने सारे मौसम आते हैं और चले भी जाते हैं, मगर जब भी वसंत और बारिश का मौसम आता है, काव्या का वो दर्द फिर से हरा हो जाता है जिसको संभालते- संभालते दो वर्ष बीत गए हैं । उसे बचपन की सभी यादें स्मरण हो जाती है कि कैसे रक्षाबंधन के दिन वह राकेश भैया को राखी बांधती थी और फिर राकेश उसको पहले तो चिड़ाता था, मगर फिर बाद में अपने गुल्लक के सारे पैसे दे देता था। कैस... »

गमज़दा सा

गमज़दा सा हूं ;उसके लिए जो तुमने मेरे साथ किया। और बहुत ही निशब्द सा है, यह दर्द जो तुमने मुझे हर पल दिया। मगर रहे तू हमेशा बाग़-बाग़ , चल छोड़ो ! हमने तुम्हें माफ़ किया। »

पहली बार जगे थे, जो अरमान!

पहली बार जगे थे , जो अरमान ! तुम्हें देखकर! वो ,निहारने का अंदाज अभी भी रमा है, मेरे जहन में । आंखों का आंखों से वार्तालाप! करने का हुनर अभी भी बसा है, मेरे ज़हन में। फिर वहम ही है तेरा, कि बदल गए हैं हम अरे!मोहब्बत भरी धरा हो तुम मेरी , और मैं बारिश का बादल! जो हमेशा बरसाता रहेगा तुम पर , मोहब्बत !मोहब्बत! मोहब्बत! »

स्वार्थ

कहीं तो छुपा है, किसी ना किसी कोने में, दुबका हुआ सा, मौके की तलाश में, कम या फिर ज्यादा, मगर छिपा जरूर है, हर मस्तिष्क में! और बचा तो ‘मानुष’ तू भी नहीं , इस स्वार्थ के जंजाल से। »

विभीषण जिंदा है (व्यंग्यात्मक)

बहुत दिनों से ढूंढ रहा था, जिसे मैं डगर -डगर, वह मुझे घर के पास ही मिल गया। कौन कहता है विभीषण मर गया , जिंदा है वो, मुझे मेरे अपनो में ही मिल गया। »

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