तीर न मारो बोल कर, उलाहना के बोल,
भीतर बैठा दर्द है, देखो आंखें खोल,
देखो आंखें खोल, सत्य स्वीकार करो तुम
चुभने वाली बात न करके प्यार करो तुम,
कहे लेखनी बोल में उपजे मीठी खीर,
छोड़ भी दो अब मत मारो वाणी के तीर।
—— डॉ0 सतीश चन्द्र पाण्डेय
उपजे मीठी खीर
Comments
8 responses to “उपजे मीठी खीर”
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उलाहना से अलंकृत , कवि सतीश जी की बहुत खूबसूरत छंद बद्ध रचना, भाव और शिल्प का अद्भुत संगम।
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुवचन
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सादर धन्यवाद
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लाजवाब अभिव्यक्ति
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बहुत धन्यवाद
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बहुत ख़ूब…वाह क्या बात है
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बहुत धन्यवाद
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