कर ले अखंड प्रतिज्ञा तू
कर खंड खंड उस दहशत को
जिससे यह विश्व है कांप रहा
हौसलो से कर तू परस्त उसको
तू दूर भ्रम का भूत भगा
दहशत की नहीं जरूरत है
असंयम का तू चित्र ना गङ
भारत संयम की मूरत है
छिन्न-भिन्न से विचार हुए
क्यों काल खुद अपना बुलाता है
जो रक्षा को तेरी खड़े हुए
क्यों उन्हीं को आंख दिखाता है
तू गौर फरमा उस मंजर पर
एक जिंदा देश वह मर गया
वह विजय रेखा है दूर बहुत
तू अभी हौसला हार गया
रणनीति धरी की धरी रही
वह करके अपना वार गया
वो ढूंढ रहे उसे राहों में
वो लाश पर चल के पार गया
दोहराना नहीं उस गलती को
बड़े देश जो कर के बैठे हैं
अब मौत भोज को आई है
अभी यम भी गर्दन ऐठे हैं
अंदाजा लगा ले खतरे का
वह प्रलय जो विनाशकारी है
नियम का पालन मत छोड़ो
यह बड़ी बहुत महामारी है
इस विनाश लीला के मंजर को
यू मजा कुछ समझना ठीक नहीं
यह मौत बड़ी बेदर्दी है
जीवन की देगी भीख नहीं
एक अखंड प्रतिज्ञा
Comments
8 responses to “एक अखंड प्रतिज्ञा”
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Good
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🙏🙏🙏
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Nice
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💐💐💐
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Nice
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धन्यवाद आपका
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Nyc
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Thanks
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