*एक-दूजे के लिए*

नारी स्नेह की मूरत है,
लुटाती प्रेम और ममता।
पुरुष पौरुष की सूरत है,
उसका प्रेम नहीं थमता।
देता है अधिक दिखावा करे कम,
दे खुशियां मिटा दे गम।
नारी ममता की मूरत है,
पुरुष संघर्ष की सूरत है,
दोनों को ही इस जहां में,
एक-दूजे की जरूरत है।।
____✍️गीता

Comments

6 responses to “*एक-दूजे के लिए*”

  1. Satish Pandey

    कवि गीता जी की यथार्थ पर आधारित बहुत सुंदर काव्य रचना है यह। भाव व शिल्प का अत्युत्तम तारतम्य है। लेखनी में प्रवाह है। बहुत खूब

    1. Geeta kumari

      इतनी सुन्दर और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक धन्यवाद सतीश जी, उत्साह वर्धन करती हुई समीक्षा के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद।

  2. बहुत ही लाजवाब

    1. Geeta kumari

      धन्यवाद

  3. अति सुंदर रचना

    1. सादर धन्यवाद चंद्रा जी

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