इक अरदास करूं तुमसे प्रभू !
मैं रो लूंगी भाग्य को अपने,
हर दुःख को चुप्पी से सह लुंगी।
बना देना मुझे निर्भया की मां,
दिल को अपने समझा लुंगी।
मगर न बनाना मुझे,
बलात्कारी की जननी,
मैं खुद को आग लगा लुंगी।
एक मां की अरदास
Comments
22 responses to “एक मां की अरदास”
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आपने बहुत सुन्दर लिखा है प्रतिमा जी आपकी भावनाओं का सम्मान करती हूं कि एक बलात्कारी कि मां कभी नहीं बनना चाहेंगी ,किंतु भगवान से प्रार्थना है कि कोई भी औरत निर्भया की मां भी ना बने कभी भी नहीं । पूरी कोशिश रहेगी कि और निर्भया नहीं ना ही निर्भया की मां बने कोई ….OH MY GOD, PLEASE NO MORE NIRBHAYA.
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बहुत बहुत आभार गीता मैम सुंदर समीक्षा के लिए
आपकी बात से मैं बिल्कुल सहमत हूं ,
बहुत ही बुरा लगता है जब जब ऐसी संवेदनशील एवं क्रुर घटनाएं
हमारे देश में घटित होती है ,हृदय भर आता है
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Nice
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Thank you
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बहुत सुंदर विचार है आपका
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धन्यवाद सर
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Sabdon k moti kaafi aakarshak hai
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Thank you
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मार्मिक
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धन्यवाद सर
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अति मार्मिक। निशब्द
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हार्दिक धन्यवाद
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बहुत ही उम्दा रचना
मार्मिक भाव-

सादर आभार
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Nice lines
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Thank you
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बहोत ही सुंदर कविता लिखी है आपने यह.👍
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Thank you
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Very nice
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Thank you
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अत्यन्त मार्मिक
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Thank you Suman ji
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