एक ख़्याल सा

याद के दरमियाँ हम मिलेंगे कभी,
फूल गुलशन में भी तो खिलेंगे कभी।

शक़ मेरे इश्क़ पे मत करो साथियाँ,
खत तुम्हें खून से हम लिखेंगे कभी।

आज तो दौर है मुफ़लिसी का मग़र,
चाँद तारे मेरे सँग चलेंगे कभी।

ज़िन्दगी ने किए सौ सितम गम नहीं,
है यकीं ग़म हमारे जलेंगे कभी।

छोड़कर जो गए वो अजीजों में थे,
हाथ अपना बेचारे मलेंगे कभी।

हो रहा है असर अब दुआ का मेरी,
ख़्वाब आँखों में उसके पलेंगे कभी।

हुस्न उसका नहीं है बतौरे बयाँ,
जिद मेरी है गज़ल हम लिखेंगे कभी।

जो गुज़र जाते हैं आज नजरें बचा,
दर पे काफ़िर तेरे वो रुकेंगे कभी।

#काफ़िर

Comments

12 responses to “एक ख़्याल सा”

    1. Qaafir Sameer Avatar

      बेहद शुक्रिया मोहतरम जनाब अनिरुद्ध साहब

    1. Qaafir Sameer Avatar

      मशकूर ओ ममनून हूँ आपकी रहमतों से

    1. Qaafir Sameer Avatar

      दिली शुक्रिया जनाब श्रीधर साहब

    1. Qaafir Sameer Avatar

      शुक्रिया साहब

  1. Purav Goyal Avatar
    Purav Goyal

    हुस्न उसका नहीं है बतौरे बयाँ,
    जिद मेरी है गज़ल हम लिखेंगे कभी।

    laajwab likhaa bhai behd hi umdaa bahut hi khuoobsurt

    1. Qaafir Sameer Avatar

      दिली शुक्रिया पूर्व जी

  2. Dev Kumar (DK) Avatar
    Dev Kumar (DK)

    so nice

    1. Qaafir Sameer Avatar
      Qaafir Sameer

      आभार प्रभु

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