कचहरियां

अप्रमेय तथ्य है सदा से ही अविकल्प
जीवन में शांति उन्हीं से पर है कायम
प्रमाण सदन तो कुंठा से ही भरे हुए
जीवन अवसाद का जो सदा बने कारण

न्याय नाम से मची है वहां पर अंधी दौड़
अन्याय का हितैषी है जहां का हर अवयव
काग भुसुंडी से दिखते हैं चारोओर कौवे
ज्ञान अंशमात्र भी कहां है पर वहां सुलभ

तिल मात्र सा भी दरार है जिन रिश्तों में
तार बनाने का इन्हें है डिप्लोमा हासिल
जन जो पहुंचे थे जख्म मरहम लेने यहां
जीवन नर्क बना गया जो भी था हासिल

फिर भी कहां कमी है इनकी महफ़िल में
हर दिन निरीह आ फंसते हैं आश लिए
बिन सोचे करने की बनी आदत जिनकी
शतरंज बिछा फांसने का नया जाल लिए

झगड़ा मतभेद स्वार्थ इंसानो को अक्सर
बेईमान कचहरियों के आंगन पहुंचाते हैं
सरकारी तंत्र सारे ही उलझे हैं यूं बदस्तर
कहां सफल हुए हैं भ्रष्टाचार और बढ़ाते हैं

Comments

4 responses to “कचहरियां”

  1. न्याय नाम से मची है वहां पर अंधी दौड़
    अन्याय का हितैषी है जहां का हर अवयव

    चलो न्याय न्याय खेलें हम

    पर वो ना खेलें
    जिनके जेब में ना हो दम
    चलो न्याय न्याय खेलें हम

  2. Geeta kumari

    कोर्ट कचहरियों पर यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई बहुत ही सटीक रचना ।कोई न फंसे इनके माया जाल में।

  3. अति, अतिसुंदर रचना

  4. अप्रमेय तथ्य है सदा से ही अविकल्प
    जीवन में शांति उन्हीं से पर है कायम
    प्रमाण सदन तो कुंठा से ही भरे हुए
    जीवन अवसाद का जो सदा बने कारण..
    अद्भुत

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