कपूत

सब कुछ मान कर जो पालते रहे
बीपत्तियों का काँटा निकालते रहे
बुढ़ापा मे वो असहाय हो गए
कपूत घर से बाहर निकालते रहे

Comments

2 responses to “कपूत”

  1. बहुत सुंदर पंक्तियां

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