करता जा अथक परिश्रम क्रोध को पी पी के।
मन को न विचलित होने दे नर ।
सदा तु करता जा सत्कर्म ।
परिस्थितियों का क्या है ?
आना-जाना लगा रहता है ।।1।।
नर के आगे सारे स्थिति पानी के बुल्ले है ।
आज जो दुख की घड़ी सामने दीवार बन खड़ी है ।
कल उन्हीं राहों पे उमंग के दीये जलाने है ।
मन के हारे हार, मन के जीते जीते ।
कबीर जी की वाणी है, नरों के लिए अमृत समान है ।।2।।
तु क्यूँ डरता समय से समय तेरे प्रतिकुल नहीं ।
समय हर नर के लिए अनुकुल है ।
पर समय के अनुकुल हर नर नहीं ।
जो नर समय के अनुकूल है, वहीं नर जग में सफल है ।
समय सबके संग है, पर समय संग कोई विरला है ।।3।।
कवि विकास कुमार
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