कर्म है बीज

कर्म है बीज
जो भी करूँगा,
वह उगेगा, खिलेगा
मुझे कल,
फल उसी के मुताबिक मिलेगा।
धर्म है प्रेम,
नफरत नहीं है,
प्रेम की राह चलता रहूंगा,
कल उसी के मुताबिक मिलेगा।

Comments

5 responses to “कर्म है बीज”

  1. Praduman Amit

    भावपूर्ण रचना प्रस्तुत किया है आपने।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Bahut sundar kavita

  3.   अति सुन्दर विचार प्रस्तुत करती हुई बहुत सुन्दर कविता

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