कल्पतरु सी बने कविता

कल्पतरु सी बने कविता,
सब के दुख हरे कविता
बेरोज़गारों को रोज़गार मिले,
बिछुड़ों को उनका प्यार मिले
ऐसी सुंदर बने कविता,
सुरतरू सी बने कविता
शोहरत की चाह हो उसे शोहरत मिले,
दौलत की चाह हो उसे दौलत मिले
निरोग रहे सभी का तन,
खुशियों से भरा हो सबका मन
ऐसी मंगल बने कविता,
देवतरू सी बने कविता
सबका सुखी घर-संसार रहे,
ऐसी कविता मेरी कलम कहे
“गीता” कहती है कुछ कर्म करो,
हो सके तो कुछ धर्म करो
मेहनत का फ़ल मीठा होता,
ये कथन कहे मेरी कविता
_____✍️गीता

Comments

4 responses to “कल्पतरु सी बने कविता”

  1. Satish Pandey

    कर्म करने को प्रेरित करती गीता जी की इस कविता में सरसता, स्वाभाविकता, सजीवता के गुण समाहित हैं। कठिन शब्दों से बचा गया है। भाषा में प्रवाह है। कविता को जीवन के हर छोर के साथ जोड़ा गया है। संप्रेषणीयता के स्तर पर खरी उतरती यह कविता बहुत सुंदर है।

    1. Geeta kumari

      कविता की इतनी सुन्दर और प्रेरक समीक्षा हेतु आपका हार्दिक आभार सतीश जी। बहुत-बहुत धन्यवाद

    1. Geeta kumari

      सादर धन्यवाद भाई जी🙏

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