कल फिर शाम आई

कल फिर शाम आई और चली गयी ,
कुछ दूर वो झिलमिलाई चली गयी .
नींद से अपना तो कोई वास्ता न था ,
बस आँखों में आई ,मुस्कुराई , चली गयी .
चाँद भी रुक के देखना चाहता था कल रत ,
उसकी माँ आई ,उसे बुलाई , चली गयी .
कल फिर शाम आई , और चली गयी .
फिर ख्वाब में कल रात वो आई , रुलाई चली गयी ,
कल फिर शाम आई ,और चली गयी ..

…atr

Comments

4 responses to “कल फिर शाम आई”

  1. राम नरेशपुरवाला

    Good

  2. Satish Pandey

    Very nice

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