कविनिकेतन

यह कविता एक ऐसे आवास के विषय में है जो सिर्फ कवि या लेखकों के मन में निर्मित है।
कवियों के उस आवास को मैंने कविनिकेतन नाम दिया है। इस कविता में उसी आवास का वर्णन है।
कविता की लय बरकरार रखने के लिए सभी महान कवियों के नाम सीधे सीधे इस्तेमाल किये गए हैं।
मेरा उद्देश्य उनका अपमान करना नहीं है।
मैं उन सभी कवियों का सम्मान करता हूँ व उनकी रचनाओं के लिए उन्हें नमन करता हूँ।
तो पेश है – “कविनिकेतन”
आशा है आपको पसंद आएगी।

जहां विचारों की विविधता और
कल्पनाओं का सम्मान है।
जहां भाषाओं का सम्मेलन और
शब्दों का आवाम है।।
जहां सोने के सिक्कों से ज़्यादा
अल्फ़ाज़ों का दाम है।
कवियों के मन में वो बसता
कवियों का एक धाम है।।

हर सदी के कलमकार का
जहां होता साक्षात्कार है।
जहां मीरा का प्रशासन है और
कबीरा की सरकार है।।
जहां दिनकर के व्यंगों से लगता
हर ज़ुबां पे ताला है।
जीवन का यथार्थ बताती
मृदुभाव मधुशाला है।।

जहां वर्ड्सवर्थ के वर्णन से
कुदरत भी शर्मा जाती है।
जहां हरिओम की अग्नि
हर मन में ज्वाला भड़काती है।।
जहां भवानी के भावों से
सब मंगल हो जाता है।
बंजर मन भी सतपुड़ा का
घना जंगल हो जाता है।।

जहां निराला की रचनाएं
ह्रदय पर कब्ज़ा करती हैं।
मेघ बन-ठन जाते हैं और
बारिश भी बातें करती है।।
विश्वास के श्रृंगार रस से
मन में प्यार बेहता है।
बशीर बद्र के बंधों का
हर दिल पर जादू रहता है।।

ग़ालिब की रूहानियत जहां के
रोम रोम में छाई है।
माखन की कलम के आगे
तलवारें धराशाई है।।
गुलज़ार गली के शेरों से
गूंजे गली-गलियारे हैं।
साहित्य रुपी रत्नाकर में
डूब चुके यहां सारे हैं।।

जहां अल्हड़ बीकानेरी की
अल्हड़ता सब पर भारी है।
अनुभवों से सिंचित होती
अनुभूति की क्यारी है।।
काल्पनिक सी उस जगह का
कविनिकेतन नाम है।
कवियों के मन वो बसता
कवियों का एक धाम है।।

जहां गीता से पेहले होते
गीतांजलि के दर्शन हैं।
तुकबंदी ज़र्रे ज़र्रे में
कविता कण कण में हैं।।
शब्दों की शमशीर तानने का
मैं भी अभिलाषी हूँ।
उस कविनिकेतन के कमरों का
मैं भी एक निवासी हूँ।।

#कलम_कुदरती

 

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