कवियों की नगरी में
भी दिल दुखाने लगें हैं लोग
ना चाहते हुए भी पास आने लगे हैं लोग।
आम जिंदगी से परेशान होकर
जी लेते हैं हम कल्पना में,
वहाँ भी हलचल मचाने लगे हैं लोग।
शोर-गुल जरा भी पसन्द नहीं है मुझको
फिर क्यों मेरे सिर पर
ढोल बजाने लगे हैं लोग।
सिलसिले बहुत कम होते हैं
मेरे मुस्कुराने के वैसे भी
तो बात-बात पर क्यों मुझको
रुलाने लगे हैं लोग।
कवियों की नगरी में
Comments
10 responses to “कवियों की नगरी में”
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बहुत ही अच्छी
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सच्चाई लिखी है आपने
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प्रज्ञा जी, बहुत सुंदर कविता है और किसी के कुछ
कह देने से इतना विचलित नहीं होते। बुरा लगता है,
मैं समझ सकती हूं ।आप दुखी ना हो हम सब आपके साथ हैं।-

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कवियों का दिल बड़ा उदार होता।
दुखों के सागर में भी डूबते हुए भी औरों के लिए पतवार होता है।
सुन्दर रचना। -

Mast
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बहुत ही उम्दा
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