“काँच का दिल”

ले चल साकी!
मुझे दरिया के पास
मेरा मन बहुत प्यासा है
मचल पड़ता है ये कांच का दिल
जब वो मेरे करीब आता है
बोल दो उसे-
“मैं उसका नहीं किसी और का हूँ”
अाने देना उसे अगर वो
फिर भी मेरे पास आता है..!!

Comments

7 responses to ““काँच का दिल””

  1. Geeta kumari

    वाह, दिल के जज्बातों को बयां करती हुई बहुत ख़ूबसूरत रचना

    1. Pragya Shukla

      धन्यवाद आपका सराहना हेतु

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    वाह

  3. सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. Pragya Shukla

      Thanks

Leave a Reply

New Report

Close