ले चल साकी!
मुझे दरिया के पास
मेरा मन बहुत प्यासा है
मचल पड़ता है ये कांच का दिल
जब वो मेरे करीब आता है
बोल दो उसे-
“मैं उसका नहीं किसी और का हूँ”
अाने देना उसे अगर वो
फिर भी मेरे पास आता है..!!
“काँच का दिल”
Comments
7 responses to ““काँच का दिल””
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वाह, दिल के जज्बातों को बयां करती हुई बहुत ख़ूबसूरत रचना
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धन्यवाद आपका सराहना हेतु
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Welcome ji
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वाह
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Tq
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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Thanks
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