कोरोना ने छीन ली जान
कितना बेबस है इन्सान |
(१) घूमा रहा सड़कों पर देखो
अपने घर के अन्दर देखो
संकट में हैं प्राण |
कितना बेबस है इन्सान ||
(२) अस्त हुआ प्रगति का सूरज
खोता देखो मानव धीरज
कितनी सस्ती हो गई जान |
कितना बेबस है इन्सान ||
(३) रिश्तों में अब आ गई दूरी लम्बी
मानव जाति ही अब मानवता भूली
अन्त्येष्टि’ को तरसे इन्सान |
कितना बेबस है इन्सान ||
“कितना बेबस है इन्सान”
Comments
8 responses to ““कितना बेबस है इन्सान””
-
कोरोना पर यथार्थ चित्रण प्रस्तुत किया है कवि प्रज्ञा जी ने ।
-

धन्यवाद
-
-

This comment is currently unavailable
-

धन्यवाद सर
-
-
अतिसुंदर भाव
-

Thanks
-
-

Nyc
-

Tq
-
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.