कुछ न था हाथ की लकीरों में……..

कुछ न था हाथ की लकीरों में

वरना होते न क्या अमीरों में।

भरे जहान में भी कुछ न मिला

हैं खाली हाथ हम फकीरों से।

आपके प्यार से तो लगता है

बंधे हो जैसे कुछ जंजीरों से।

किसके जाने से जान जाती है

कौन रहता है वो शरीरों में।

कोई भटका हुआ ही आएगा

हम हैं तन्हा खड़े जजीरों सेे।

———सतीश कसेरा

Comments

5 responses to “कुछ न था हाथ की लकीरों में……..”

  1. Amit sharma Avatar
    Amit sharma

    nice poem…rightly said

    1. satish Kasera Avatar
      satish Kasera

      Thanks Amit Sharma

  2. Panna Avatar

    kavita kahna ki kala aaki bahut achi he…

  3. satish Kasera Avatar
    satish Kasera

    Thanks Panna

  4. Satish Pandey

    शानदार कविता

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