कुमाउँनी कविता

किलै खिलना हौला
साल भरि में एक्कै बैर गुलाब
वन भरि कुइयाँ फुलि रौ
घर-घर गुलाब।
दिखै बेर चार दिनैकि
रंग-बिरंगी चमक,
फिर पैंली को झौ
कांडा वालो है जाँ गुलाब।
नै खिलनो त कि हुनो
खिलिगौ त की भौ
मन लगूनै में छ हिसाब।
खिली गौ छ्यो त
क्वे दिनौ रै जानो
आपना मनै कि कै जानो।
— डॉ0 सतीश चंद्र पाण्डेय, (पीएचडी), चम्पावत।

Comments

2 responses to “कुमाउँनी कविता”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ

    1. बहुत धन्यवाद

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