बातें बताओ खुल कर
क्यों इस तरह हो रूठे
कहते थे प्यार दूँगा
अब बन गए हो झूठे।
बिन बात मुँह फुलाकर
चुपचाप क्यों हो बैठे,
क्या कह दिया है हमने
जो इस तरह हो ऐंठे।
लगता है पड़ गए हैं
कुछ नफ़रतों के छींटे,
कसमें थीं प्यार की जो
वो भूल कर यूँ बैठे।
आशा थी जिन फलों से
वे बन रहे हैं खट्टे
छोड़ो ये राह आओ
दो बोल बोलो मीठे।
क्यों इस तरह हो रूठे
Comments
2 responses to “क्यों इस तरह हो रूठे”
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“आशा थी जिन फलों से
वे बन रहे हैं खट्टे
छोड़ो ये राह आओ
दो बोल बोलो मीठे।” बहुत ही सुंदर भाव। अतिसुंदर रचना।। -
बहुत सुंदर प्रेमाभिव्यक्ति करती हुई कवि सतीश जी की अत्यंत सरस पंक्तियां, …….. “बिन बात मुँह फुलाकर चुपचाप क्यों हो बैठे,
क्या कह दिया है हमने जो इस तरह हो ऐंठे। “अपने साथी को मनाती हुई बहुत सुन्दर कविता । सुन्दर भावाभिव्यक्ति
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