ख़ामोशियाँ

यूँ तो ख़ामोशियों की
कोई ज़ुबान नहीं होती लेकिन…
प्रेम में ख़ामोशियों को समझना
बहुत मायने रखता है l
अगर एक दूजे की ख़ामोशियों को
भी नहीं समझ पाए तो….
लफ्ज़ तो लफ्ज़ हैं,
कितना भी बोलो सब अर्थहीन है॥
______✍गीता

Comments

6 responses to “ख़ामोशियाँ”

  1. Praduman Amit

    बहुत ही अच्छा चित्रण किया है गीता जी।

    1. Geeta kumari

      आभार व्यक्त करती हूँ सर

  2. Satish Chandra Pandey

    कवि गीता जी की लेखनी से निकली बहुत सुंदर काव्य रचना है यह। भाव को सुन्दर शिल्प में गढ़ कर कविता का रूप दिया गया है।

    1. Geeta kumari

      इतनी सुन्दर और प्रेरक समीक्षा के लिए आपका हृदय से धन्यवाद सतीश जी

  3. बहुत अच्छा लिखा है वाह

    1. Geeta kumari

      बहुत बहुत धन्यवाद चन्द्रा जी, प्रोत्साहन हेतु आभार

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