कितना बोलता है दिल
पर तुम नहीं सुनते
मेरी धड़कनों की सदा
क्यों नहीं सुनते
खामोंश हैं लब मेरे
कुछ मजबूरियां हैं इसलिए
वरना ऐसा नहीं है कि
तुमसे प्यार हम नहीं करते…
खामोंश हैं लब
Comments
6 responses to “खामोंश हैं लब”
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वाह प्रज्ञा जी बहुत खूब, सुन्दर अभिव्यक्ति
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Thanks
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अदभुत
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Tq
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, अतिसुंदर
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बहुत उत्कृष्ट रचना
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