6 Comments

  1. बहुत गहराई है आपकी कविता में ऋषि जी ।
    यहां कुम्हार से अर्थ है भगवान से, और खिलौने से अर्थ है इंसान से ।
    जब कोई इंसान जीवन की कठिनाइयों से परेशान हो जाता है,तो ऐसे ही भाव उठते है हृदय में । व्यथित हृदय का बहुत ही खूबसूरती से वर्णन किया है । बहुत स्तरीय लेखन

  2. बेहतरीन अभिव्यक्ति…
    आपने मुझे सूरदास का दोहा याद दिला दिया:-
    “जल विच मीन पियासी
    मोहे सुनि-सुनि आवै हासी”
    अर्थात्
    परमात्मा तो स्वयं मनुष्य के अन्दर विद्यमान है और मानव उससे मिलने के लिए अन्यत्र साधन खोजता है…
    ठीक उसी प्रकार आपने भी अपनी बात दो अर्थों में प्रकट की है
    इसलिए आपकी कविता में विशोक्ति अलंकार है एवं समाज के लिये हितकर भी एवं उपदेशक भी है आपकी यह रचना…

Leave a Reply