वो हुनर में हमारी बराबरी करने चले थे
अरे ! वो नासमझ हैं ये क्या करने चले थे
हमने तो तबाह कर दिया खुद को मोहब्बत में
तब जाकर लिखना आया है
वो तो जल्दबाजी में हमें
खुदा’ लिखने चले थे
यूं तो लिखने को कुछ भी लिख सकते हैं वो
पर वो तो हमारी ही कथा लिखने चले थे
कोई जाकर रोंको उन्हें
मत लिखें हम पर
वरना हम सरेआम बन जाएंगे एक तमाशा
हम तो दिलजले हैं
दिल के जख्म लिखा करते हैं
पर वो तो हमें बेवफा लिखने चले थे…
खुदा लिखने चले थे..!!
Comments
6 responses to “खुदा लिखने चले थे..!!”
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अति, अतिसुंदर
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Tq
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बहुत ख़ूब
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Tq
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बहुत बढिया लिखा है आपने
यह रचना उच्चकोटि की है जिसकी तारीफ करने का लिए मेरे पास शब्द नहीं हैं-

Tq
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