खो गई मिट्टी की लाली

 
 

सोमवार, 17 अगस्त 2015

कविता …..खो ग ई मिट्टी की लाली………

 

खो गई है मिट्टी की लाली।
मुरझा गई है धान की बाली॥
सुख गई है बरगद की डाली
उजड़ी बगिया रोता माली॥

खो गई है गिद्धों की टोली।
गुमसुम  है कोयल की बोली।।
उठ गई गॊरिया की डोली ।
राजहंसनी को लगी है गोली॥

उठी गर्जना भूकंप वाली।
बादल फूटा बरसा पानी।।
बह गई बस्ती भुमि खाली।
कंजूस हो गया पर्वत दानी।।

लुट रही जंगल की झोली ।
सुनो वृक्षों की श्रापित बोली।।
कलपुर्जों ने खेली होली ।
दीवाली, धुओं से रंगी रंगोली ।।

घर आ गये जंगल के हाथी।
शेर हो गये अतीत के वासी॥
उड़ चले हैं पंछी प्रवासी ।
मिट रहे हैं कछुए अविनाषी ।।

अम्ल हो गई बरसा रानी।
अम्बर सुना छुपी चांदनी।।
भौरों की कब सुनी रागनी ।
तितली की भी यही कहानी ॥

मानव बना है भोग विलाषी।
भौतिकता का है अभिलाषी।।
प्राप्ति का है मात्र जिज्ञाषी ।
नहीं चलेगी अब अय्यासी ॥

प्रदूषित हवा की रवानी।
प्रदूषित नदीयों का पानी॥
सब इंसानों की मनमानी।
सिर धरे हैं अब विज्ञानी।।
  ओमप्रकाश चन्देल”अवसर”

पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
7693919758

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