गजल- उजाला हो जाये |

गजल- उजाला हो जाये |
कभी हमारे भी घर आइये अंधेरों मे उजाला हो जाये |
आपके रूप की चाँदनी मे अंधेरों का मुंह काला हो जाये |
फैला है हर तरफ कोरोना हम आए तो आए कैसे |
कैसे निकलु बच के कही कोरोना निवाला हो जाये |
सारे दावे सबके धरे के धरे रह गए वो बढ़ता ही गया |
ऐसा न हो वो लड़ते रहे और उसका बोलबाला हो जाये |
बड़ा गुमान था उसको अपनी चाल औ पैंतरा बाजी पर |
बंद हो गये सारे एप औ धंधा उसका दिवाला हो जाये |
कहता कुछ और करता कुछ और बड़ा चालाक है वो |
कब्जा करता गैरो जमीन खुद देश निकाला हो जाये |
चाल तेरी चलेगी नहीं घिर चुका तू अपने पड़ोसियो से |
तू आजा अब हिन्द की पनाह भारत रखवाला हो जाये |

श्याम कुँवर भारती (राजभर)
कवि /लेखक /गीतकार /समाजसेवी
बोकारो झारखंड मोब -9955509286

Comments

6 responses to “गजल- उजाला हो जाये |”

    1. Shyam Kunvar Bharti

      हार्दिक आभार आपका पंडित जी

  1. वर्तनी का ध्यान रखें

  2. Satish Pandey

    Good

  3. करो ना बढ़ता जा रहा है और जिंदगी खत्म होती जा रही

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