गरम हवा बन कर लू,
तन-मन को जला रही है l
कैसे बाहर निकलूँ मैं घर से,
यह धरा को भी तपा रही है l
एक बारिश को तरसता,
आज क्यूँ है मेरा मन l
अभी तो ज्येष्ठ बाकी है,
आएगा कब सावन॥
____✍गीता
गरम हवा
Comments
4 responses to “गरम हवा”
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वर्तमान मौसम का बहुत सुंदर चित्रण। बहुत बेहतरीन लिखा है।
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उत्साह वर्धन हेतु बहुत बहुत धन्यवाद सतीश जी
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हकिकत बयां करती है आपकी कविता ‘गरम हवा”।
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आभार सर🙏
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