गल न जाये मन भरी बरसात में

रोज बारिश हो रही है प्यार की
तब भी क्यों नफरत उगी है सब तरफ,
चाहते हैं एक होना आप हम
तब भी क्यों दूरी बनी है हर तरफ।
दिल की निर्मल सी सड़क के इस तरफ
भांग उग आई है इस बरसात में
इसलिए हम यूँ उलझते रह गए
ढूंढ कर कोई कमी हर बात में।
रास्ते टूटे हुए हैं किस तरह
आप तक पहुंचेगा मन बरसात में
जब तलक बारिश रुकेगी तब तलक
गल न जाये मन भरी बरसात में।

Comments

6 responses to “गल न जाये मन भरी बरसात में”

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत बढ़िया प्रस्तुति

    1. धन्यवाद जी

  2. Kumar Piyush

    वाह वाह

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

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