गांव में आई हूं मैं ।
बहुत दिनों के बाद।
खेतों में सरसों पीली देखी,
गगन की रंगत नीली देखी।
खूब चमकते तारे देखे,
बहुत दिनों के बाद।
गेहूं की सुनहरी बाली देखी,
तरुवर की झूलती डाली देखी।
गन्नों की हरियाली देखी,
बहुत दिनों के बाद।
चूल्हे पर बनी साग और रोटी,
दूध पर वह मलाई मोटी।
रस की बनी खीर खाई है,
बहुत दिनों के बाद।
ताजा-ताजा गुड़ बनकर आया,
गरम-गरम गाजर का हलवा खाया,
सभी छोटे बड़ों का प्रेम पाया,
बहुत दिनों के बाद।
गांव में आई हूं मैं,
बहुत दिनों के बाद।
____✍️गीता
गांव में आई हूं
Comments
4 responses to “गांव में आई हूं”
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अतिसुंदर भाव
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सादर धन्यवाद भाई जी 🙏
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कवि गीता जी ने ग्रामीण जीवन की सरसता का बखूबी चित्रण किया है। बहुत सुंदर अभिव्यक्ति। सुन्दर भाव, उत्तम शिल्प।
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इतनी सुंदर समीक्षा के लिए अभिवादन सर, उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक धन्यवाद सतीश जी
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