गिल्ली डंडे के खेल पुराने हो गए,
कंचे के काँच दिखे जमाने हो गए,
भरे रहता था आसमाँ जिन पतँगों से कभी,
अब ज़मी पर बच्चे भी निराले हो गए।।
राही (अंजाना)
गिल्ली
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