हास्य कविता
बिट्टू घूम रहा था गुमसुम,
हाथ में लेकर एक फोटो
मां ना जाए छोड़कर कहीं,
इस उलझन में था वो
नाना जी को फोन लगाया,
अपने मन का हाल बताया
नाना -नानी अचरज में आए,
बेटी को फिर फोन लगाए
“बिट्टू ये क्या बोल रहा है”
किस फ़ोटो को ले डोल रहा है
फ़ोटो देख के मां मुसकाई,
सारी बात समझ में आई
मां-पापा की शादी की फ़ोटो लेकर,
बिट्टू गुमसुम घूम रहा है
पापा को पहचान ना पाया,
क्योंकि बाल उड़े और पेट बढ़ आया
फ़ोटो देख के उसका सिर चकराया,
बिट्टू कितना था घबराया
बिट्टू का भोलापन सबको भाया,
हंस हंस कर सबका पेट दुख-आया
Tag: बाल कविताएँ
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मां के साथ ये कौन है
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हम स्कूल चलेंगे
शीर्षक:- ‘हम स्कूल चलेंगे’
हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेँगे,
सीखेंगे अच्छी बातें और पायेंगे ज्ञान,
पढ़ लिखकर हम बनेंगे अच्छे और महान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
प्रार्थना सभा में मिल गाएंगे राष्ट्रीय गान,
सबको बतायेंगे कि है मेरा भारत देश महान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
पढ़ेंगे हिन्दी, अंग्रेजी, संस्कृत और विज्ञान,
पायेंगे गुरूजन से गणित का सारा ज्ञान,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
हम प्रेम और भाईचारे से रहना सीखेंगे,
भूल से भी आपस में न हम कभी लड़ेंगे,
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।
हाँ, हम स्कूल चलेंगे जहाँ हम खूब पढ़ेंगे।।रचनाकार:-
अभिषेक शुक्ला (सहायक अध्यापक)
प्राथमिक विद्यालय लदपुरा
जिला- पीलीभीत
उत्तर प्रदेश -
शिक्षक
बचपन से ही शिक्षक के हाथों में झूला-झूला करते हैं,
ज्ञान का पहला अक्षर हम बच्चे माँ से ही सीखा करते हैं,
प्रथम चरण में मात-पिता के चरणों को चूमा करते हैं,
दूजे पल हम पढ़ने- लिखने का वादा शिक्षक को करते हैं,
विद्यालय के आँगन में शिक्षक हमसे जो अनुभव साझा करते हैं,
उतर समाज सागर में हम बच्चे फिर कदमों को साधा करते हैं,
एक छोटी सी चींटी से भी शिक्षक हमको धैर्य सिखाया करते हैं,
सही मार्ग हम बच्चों को अक्सर शिक्षक ही दिखाया करते हैं,
धर्म जाति के भेद को मन से शिक्षक ही मिटाया करते हैं,
देश-प्रेम संग गुरु सम्मान भाव शिक्षक ही जगाया करते हैं,
जीवन के हर क्षण को शिक्षक शिक्षा को अर्पण करते हैं,
इसी तरह हम अज्ञानी बच्चों को शिक्षक सदज्ञान कराया करते हैं।।
राही (अंजाना)
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ज्ञान
जिसको जैसे समझ आये समझाना पड़ता है,
एक शिक्षक को बड़ा दिमाग लगाना पड़ता है,
बहुत शरारत करते हैं जब,
बच्चे मन के सच्चे हैं जब,
गुरु ज्ञान की महिमा को फिर सबको दिखलाना पड़ता है।।
राही (अंजाना) -

क्यो कुछते हो परतीभा के परतीभाओ को ।
क्यो कुचलते हो परतीभा के परतीभाओ को,
चंद पैसो के लिए तुम्हारे घर खुशी जाती पैसो की,,
यहाँ परतीभा वाले बच्चे की लाशे मिलते नदी या रेल किनारे मे,,
क्यो कुचलते हो चंद पैसो के लिए,,JP singh
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अगर मै कुड़ा कागज होता,
अगर मै कुड़ा-कागज होता ,
तो मेरा कोई ना सुबह होता ना शाम होता, ना घर होता ना परिवार होता,
शिर्फ मेरे साथ रास्ते का धुल होता,,,,,
अगर मै कुड़ा–कागज होता,
कभी पढ़ने का काम आ जाता कभी बच्चे के खेलने मे काम आ जाता ,,
अगर मेरी अस्तीत इंसान के बीच खत्म भी हो जाती ,,
तो मै किसी काबारी को भी काम आता!! ,अगर मै कुड़ा -कागज होता_,
ना मेरी कभी अंत होती !!
मुझे फिर से नया बनाया जाता कभी अफसरो के बीच कभी मजदुर के बीच सिपाही के बीच मेरा सुबह शाम होता ,
मेरा वही परिवार होता मेरा हँसता खेलता सुबह शाम होता ,,
फिर कभी हवा के साथ के साथ कभी रोड पर धुल मे खुले -आम लर जाता,,
अगर मै कुड़ा-,कागज होता।।।
जेपी सिह -
गिल्ली
गिल्ली डंडे के खेल पुराने हो गए,
कंचे के काँच दिखे जमाने हो गए,
भरे रहता था आसमाँ जिन पतँगों से कभी,
अब ज़मी पर बच्चे भी निराले हो गए।।
राही (अंजाना) -
काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती
✍✍✍काश मेरे मुल्क मे ना जाती ना धर्म होती ,
शिर्फ एक इंसायनित की नाम होती,,
तो दिल्ली मै बैठे गद्देदार की रोटी नही सिझती।
रामायण और कुरान मे भेद बताकर अपनी रोटी सेकते है गद्देदार ,,
अगर बच्चे प्रर्थाना करते तु ही राम है,तु रहीम है, तु करीम —–
तो सौ वर्षो से हो रही गाथा मे भेद बताकर मुल्क को बाटँते हो गद्देदार,
अब बस करो अपनी रोटी सेकना गदे्दार मेरे बच्चे के हाथ मे फुल के बदले हथियार देना बंद करो।
मेरे मुल्क को मत बाँटो तु बाँट लो अपना परिवार हो सके तो छोड़ मेरे मुल्क को चल जा दुसरे मुल्क के गद्देदार को पकड़ ले तु हाथ,,
मेरे मुल्क को मत बाँटो गद्देदार।।
खुन पसीना से सीचा है गाँधी इसे मत तु कर वर्वाद ,
तु छोड़ दे मेरे मुल्क को गद्देदार।।✍✍✍
ज्योति -
बचपन
बारिश के मौसम में कागज़ की कश्ती
डूबने का इंतज़ार ही करती रह गयी।
और ये बच्चे उड़ने के सपने लिए
उस कागज़ को पढ़ते ही रह गए। -
पापा
अगर देती जन्म “‘” माँ””
चलना; सभलना सिखाते है पापा।
. …………. जितना भी बच्चे फरमाइस करते;
पुरा करते है पापा।
अपना सारा अरमान कुचलकर; बच्चे के अरमान को पूरा करते पापा।।
अपने बदन पर कपड़ा भले ना हो;_
. बच्चे के बदन पर कपड़ा पुरा करते पापा —
अपने आज तक बंद आसमान मे सोए नही
…………….. बच्चे के घर पंखा लगाते पापा।।
घर से दुर रहकर भी अपने कमी का एहसास नही नही होने देते इसी को कहते हे पापा।
अपना सारा अरमान कुचलकर बच्चे के अरमान को पुरा करते पापा ।।
please forgive me father did you not got.jyoti
mob_9123155481 -
जोकर
पहने सर पर नीली टोपी
उछलता -कूदता आता है
कभी इधर तो कभी उधर
नाचता और नचाता है।भर अपने थैले में टॉफी
बिस्कुट सबको लाता है
हाथ मिलाकर बच्चों से एक
जादू की झप्पी लेता है।रोते बच्चे को झट से अपनी
बातों में वो लेता है
मुँह फुला कर तोंद दिखाकर
खुशियाँ उसको देता है।बच्चों के संग मिलजुल कर वो
खेलता और खिलाता है
चंद पैसो के खातिर वो ये
सब कुछ हँस कर करता हैहज़ारों गमों के समुन्दर को वो
ज़ाहिर कभी न करता है
कहलाता अपने आप को जोकर
खुशियाँ हर- क्षण बिखेरता है।। -

कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे
कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे,
भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे,
उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे,
बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे,
तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे,
शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे,
बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे,
हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।।
राही (अंजाना)
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मजबूर बच्चे
कितने मजबूर होकर यूँ हाथ फैलाते होंगे,
भला किस तरह ये बच्चे सर झुकाते होंगे,
उम्मीदों के जुगनू ही बस मंडराते होंगे,
बड़ी मशक्कत से कहीं ये पेट भर पाते होंगे,
तन पर चन्द कपड़े ही बस उतराते होंगे,
शायद सोंच समझ कर ही ये मुस्काते होंगे,
बहुत संग दिल होकर ही वो इतराते होंगे,
हालत देख कर भी जो न प्रेम भाव दिखलाते होंगे।।
राही (अंजाना)
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खिलौने वाला
हाथ में लेकर सीटी आता
साइकिल पर होकर सवार
एक डंडे पर ढेर से खिलौने
जिसमे रहते उसके पासगली गली और सड़क सड़क
बच्चों की खुशियाँ लाता है
देख के बच्चे शोर मचाते
खिलौने वाला आया हैदेख कर चिंटू मिंटू से कहता
धनुष बाण तो अब मैं लूँगा
तब मिंटू चिंटू से कहता
हनुमन गदा को मै ही लूँगाइतने में आती है भोली
देख के बर्तन करती ठिठोली
कहती बर्तन मैं भी लूंगी
लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ीसोहन मोहन दौड़े आते
कहते हम भी लेंगे कुछ
एक है कहता वंशी लूँगा
दूजा कहता मैं लूँगा फूलदेकर खुशियाँ सबको जाता
सबके मन को भाता है
गली गली और सड़क सड़क
सबको खुशियाँ बिखरता है।। -
खिलौने वाला
हाथ में लेकर सीटी आता
साइकिल पर होकर सवार
एक डंडे पर ढेर से खिलौने
जिसमे रहते उसके पासगली- गली और सड़क- सड़क
बच्चों की खुशियाँ लाता है
देख के बच्चे खुश शोर मचाते
खिलौने वाला आया है।देख कर चिंटू ,मिंटू से कहता
धनुष बाण तो अब मैं लूँगा
तब मिंटू ,चिंटू से कहता
हनुमन गदा को मै ही लूँगा।इतने में आती है भोली
देख के बर्तन करती ठिठोली
कहती बर्तन मैं भी लूंगी
लूँगी साथ में गुड़िया चूड़ी।सोहन – मोहन दौड़े आते
कहते हम भी लेंगे कुछ
एक है कहता वंशी लूँगा
दूजा कहता मैं लूँगा फूल।देकर खुशियाँ सबको जाता
सबके मन को भाता है
गली- गली और सड़क -सड़क
सबको खुशियाँ बिखरता है।। -
गुब्बारे
देख गुब्बारे वाले को जब
बच्चे ने आवाज़ लगाई
दिला दो एक गुब्बारा मुझको
माँ से अपनी इच्छा जताई।देखो न माँ कितने प्यारे
धूप में लगते चमकते सितारे
लाल, गुलाबी, नीले ,पीले
मन को मेरे भाते गुब्बारे।देख उत्सुक्ता माँ तब बोली
बच्चे माँ मन रखने को
भैया दे दो इसको गुब्बारा
पैसे ले लो मुझसे तुम। -
ममता
एक युवती जब माँ बनती है,
ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है,
ज़ज्बात रंग -बिरंगे उसके,
बच्चे के रंग में ढलते हैं,
दिल के तारों से हो झंकृत,
लोरी की हीं गूंज निकलती,
माँ अल्फाज़ में जैसे हो,
दुनियां उसकी सिमटती चलती ,
फिर क्या, नयनों में झिलमील सपने,
आँचल में अमृत ले चलती ,
पग -पग कांटे चुनती रहती,
राहों की सारी बाधाएं,
दुआओं से हरती चलती,
हो ममता के वशीभूत बहुत,
वो जननी बन जीवन जनती है,
एक युवती जब माँ बनती है,
ममता के धागों से बच्चे का भविष्य बुनती है।। -

बनाकर कागज़ की कश्तियाँ
बनाकर कागज़ की कश्तियाँ पानी में बहाते नज़र आते थे,
एक रोज़ मिले थे वो बच्चे जो अपने सपने बड़े बताते थे,
बन्द चार दीवारों से निकलकर खुले आसमान की ठण्डी छावँ में,
इतने सरल सजग जो अक्सर खुली किताब से पढ़े जाते थे।।
राही (अंजाना) -
सवाल पूछा
संस्कार में दबे
बच्चे से
घूरते हुए
अध्यापक ने
सवाल पूछा,
बेटा ये बताओ
हम कौन?
बच्चा मुस्कुराते बोला,
अध्यापक जी
आप गुरु हम शिष्य
यानी गुरु धाम में
हम पढ़ रहे
आप पढ़ा रहे
‘हम कौन?
हम कौन?’अशोक बाबू माहौर
-
तब आना तुम
तब आना तुम,
जब हिना का रंग कई दफा
चढ कर उतर जाए।
जब अपने बच्चे की खातिर
अबला वात्सल्य प्रेम में बिखर जाए
तब आना तुम,
जब मेरे जुनून जर्जर हो जाए और
मेरे पास बहुत कुछ हो,
दिखलाने को,
बतलाने को,
समझाने को,
तब आना तुम
जब हमारे बीच की खामोशी को
इक उम्र हो जाए,
और ये सफेद इश्क़ भी
अपने इम्तिहान से शर्मसार हो जाए।
तब आना तुम।
जब आना तुम,
आकर लिपट जाना
जैसे चंद लम्हे पहले ही मिले हो।
हवा के रूख की परवाह किए बिना
सांसों को छू लेना
और इस शाश्वत प्रेम को
दिवा की रोशनी में दर्ज करा देना। -
जंगे आज़ादी (आजादी की ७०वी वर्षगाँठ के शुभ अवसर पर राष्ट्र को समर्पित)
वर्ष सैकड़ों बीत गये, आज़ादी हमको मिली नहीं
लाखों शहीद कुर्बान हुए, आज़ादी हमको मिली नहींभारत जननी स्वर्ण भूमि पर, बर्बर अत्याचार हुये
माता बहन बेटियों के, इज्ज़त धन सम्मान लुटेबिक गये धरम लुट गये करम, सब ओर गुलामी बू छायी
प्राचीन सभ्यता संस्कृति गौरव, भूल गये हम सच्चाईब्राह्मण कहता हम सर्वशेष्ट, छत्रिय कहता हम शासक है
बनिया कहता हम धन कुबेर, हरिजन अछूत बस सेवक हैमंदिर मस्जिद स्कूल सभी, जाना हरिजन को वर्जित था
ईश्वर था उच्च जातियों का, सब पुण्य उन्हीं को हासिल थाबेकार अगर हो जाय अंग, मानव ताकत घट जाती है
सब लोग दबा सकते उसको, आबरू मान छिन जाती हैभारतजन का एक बड़ा भाग, हमने ही निष्क्रिय कर डाला
शक्तिहीन बना इनको हमने, कमजोर देश को कर डालाहर वर्ग धर्म में फूट डाल, दंगे फ़साद करवाते थे
राजा राजा जनता राजा, हिन्दू मुस्लिम लड़वाते थेआपस में जब फूट पड़ी, अंग्रेजों कि बन आई थी
आज़ादी कैसे मिल सकती, आपस में ठनी लड़ाई थीकुछ रजवाड़े कुछ नेतागड़, गोरों के सिपहसलार बने
कुछ राय बहादुर सर की ताज, बने गोरों के सच्चे बन्देअन्न, कपास जूट लोहा, भर भर जहाज़ ले जाते थे
हर साल नया लंदन बनता, हर साल स्वर्ग बन जाते थेकंगाल हो गया देव भूमि, लाखों भूखे नंगे फिरते
हर साल पड़े बंगला अकाल, हर साल हज़ारों जरे मरेयह देश हमारा अपना था, सब चीज़ यहाँ कि उनकी थी
अंग्रेज़ हमारे स्वामी थे, बेड़ियाँ पैर में जकड़ी थीकानून न्याय सब उनका था, हम बने मूक दर्शक केवल
लाखों बिस्मिल आज़ाद मरे, हम मौन रो रहे थे केवलदेवभूमि उद्धार हेतु, गांधी का अवतार हुआ
भारत जननी स्वर्ण भूमि में, नया रक्त संचार हुआसत्य अहिंसा निर्भयता की, बचपन में शिक्षा पाई
मानव सेवा सर्वशेष्ठ धर्म, माता ने यही सिखाई थीइंग्लैंड गये शिक्षा लेने, आज़ाद मुल्क की हवा मिली
आज़ादी है अनमोल रत्न, जौहरी हृदय को भनक लगीभाषण लिखने पढ़ने की, गोरे केवल अधिकारी थे
पेशा चुनने धन रखने की, केवल वे ही अधिकारी थेकाले हिन्दुस्तानी कुत्ते, दोनों ही एक बराबर थे
होटल गिरजा में जाने से, भारतवासी वर्जित थेगोरे काले का भेद देखकर, गाँधी का दिल भर आया
आज़ादी है एकमात्र लक्ष्य, दिल में यह बात उभर आयाभारत आकर देख दुर्दशा देश की गाँधी रोया
कैसे टूटे लौह बेड़ियाँ, इस विचार में खोयासत्य अहिंसा जन क्रांति का, मार्ग श्रेष्ठ व उत्तम है
मात्रभूमि की मुक्ति अर्थ, बस मार्ग यही सर्वोत्तम हैसत्य अहिंसा शस्त्र ग्रहण कर, आज़ादी रण में कूद पड़ा
आज़ादी का शंख फूंककर, भारत छोड़ो आवाज़ दियालार्ड ह्यूम की कांग्रेस, निर्जीव शक्ति से हीन बनी
कर्मठ नीतिज्ञ नेता अभाववश, जन जन मन से दूर हटीगाँधी का नेतृत्व मिला तो, प्राण शक्ति संचार हुआ
एक नयी शक्ति एक नया जोश, ले कांग्रेस तैयार हुआतैयार हुआ संघर्ष हेतु, अन्याय गुलामी के विरुद्ध
जन जन में जागृति लाने को, चल पड़े कांग्रेसी विश्रुब्धझंडा कांग्रेस नीचे, हर वर्ग किस्म के लोग जुटे
जंजीर गुलामी तोड़ेंगे, लाखों हज़ार कंठ स्वर फूटेनेताजी नेहरु पटेल, राजेन्द्र रत्न अब्दुल कलाम
अम्बेडकर राजा जयप्रकाश, चल पड़े तिरंगा हाथ थामधनवान पुत्र वनिता छोड़े, सब मोह नेह से मुँह मोड़े
आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े फकीरी वेश धरेएक नयी चेतना नयी लहर, जन जन में भर आयी थी
उठ खड़ा हुआ सम्पूर्ण देश, आज़ादी की लिप्सा जागीचल पड़ा देश गाँधी पीछे, सब छोड़ मोह माया धन जन
भर गये जेल अंग्रेजों के, अभिमान मान उनके टूटेगाँधी की आवाज़ राह पर, जत्थे के जत्थे निकल पड़े
निज माथ हथेली पर रक्खे, शत शत सहस्त्र इन्सान चलेचल पड़े छोड़ रोते बच्चे, कोई सुहाग की रात तजे
बूढ़े माँ बाप छोड़ कोई, कोई धन राज्य मान छोड़ेमाता बहनों कि फौज़ देख, चल पड़ी पोंछ सिन्दूर माथ
मातृभूमि को मुक्त कराने, चल पड़ी नारियों की बरातनिकल पड़े नवयुवक छोड़, कॉलेज पढ़ाई सब अपनी
आज़ादी की आग जलाने, चल पड़े नवयुवक नवयुवतीछोड़ वकालत कोर्ट चला, कानून पंडितों का जत्था
भूखे नंगे श्रमिकों का, निकल पड़ा पैदल जत्थाछोड़ किसानी चले भूमिधर, व्यापारी व्यापार छोड़ कर
आजादी का दीप जलाने, चले सिपाही कफ़न बांध करमंदिर मस्जिद गुरुदारे, बन गये सभा स्थल सारे
आज़ादी की प्रतिमा को, हर रोज़ पूजते जन सारेहर रोज़ हजारों आते थे, संदेश सुनाये जाते थे
हर गाँव गली में जाकर के, सब लोगों तक पहुँचाते थेदेश में निर्मित अपनी चीज़े ही, भारतवासी अपनाओ
अगर रोकनी ब्रिटिश लूट है, भाई भाव स्वदेशी लाओबहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, मोह विदेशी छोड़ो
ब्रिटिश माल की होली फूंको, कानून ब्रिटिश की तोड़ोमाल विदेशी की होली, हर गाँव गली में खूब जली
ब्रिटिश किताबें कपड़े लत्ते, गोरों की सम्मान जलीबहिष्कार कर ब्रिटिश माल का, लोग स्वदेशी अपनाये
हर घर में चरखा चलता था, घर घर वस्त्र बनाते थेजूट कपास चाय कहवा, ब्रिटिश मिलों कि जननी थी
अंग्रेज़ व्यापारी को हमने, इनकार किया इनको देनीब्रिटिश मिलें हो चलीं बंद, लंदन में हाहाकार मचा
चरखा करघा पर रोक लगे, लंदन में आवाज़ उठाब्रिटिश मिलें हो जाय बंद, यह उनको नहीं गँवारा था
खो जाय हाथ से पारसमणी, हरगिज़ यह नहीं गंवारा थाभारत जन के इन कामों से, गोरे शासक थे घबराये
सदियों से दबी जातियों का, उठना कैसे उनको भायेहर रोज़ हजारों चले जेल, हर रोज़ गोलियाँ चलती थी
हर रोज़ सैकड़ों विधवा हों, हर रोज़ चितायें जलती थींजलियाना का बाग़ देख,कुर्बान सैंकड़ों हुए जहाँ
जनरल डायर की गोली से, सिन्दूर हजारों मिटे जहाँखून का हर कतरा कतरा, हर चोट जिस्म पर पड़ा हुआ
गोरी शासन कि नींव ईट, हर रोज़ हिला खोखला करताज्यों ज्यों अत्याचार बढ़े, चिनगारी जोर पकड़ती थी
लाखों शहीद कुर्बान हुए, पर आग लगी न बुझती थीएक ओर खड़े थे शांति वीर, एक ओर क्रांति मतवाले थे
एक ओर अहिंसा के सेवक, एक ओर खून के प्यासे थेआज़ाद भगत सिंह बिस्मिल ने, एक लहर क्रांति की फैलायी
आजादी मस्तक माँग रही, आवाज़ देश भर में छायीबम फेंक अंग्रेजी संसद में, इन्क़लाब भगत सिंह चिल्लाया
सोती जनता की नींद तोड़, गोरी शासन को झकझोरापंजाब के कोने कोने में, इक आग लाजपत ने फूंका
आजादी की समर भूमि में, वह वीर निडर होकर जूझाबलिदान हो गया देश अर्थ, बर्बर शासक के हाथों से
यह खून व्यर्थ नहीं जायेगा, आवाज़ उठी हर बूंदों सेभगत सिंह सुखदेव गुरु, हँसते फांसी पर झूल गये
जय जननी जय कर्मभूमि, जपते आज़ाद कुर्बान हुएदेश पर मरने वालों का, बलिदान रंग लेकर आया
अन्यायी शासन के विरुद्ध, जेहाद देश भर में छायाआज़ादी के रंग मंच पर, गाँधी सुभाष दो नायक थे
सत्य अहिंसा जन क्रांति के, दोनों की सच्चे साधक थेलाहौर कांग्रेस सम्मेलन से, दोनों नेता दो राह चले
सुभाष क्रांति की राह पकड़, कांग्रेस से मुहँ मोड़ेब्रिटिश राज की गिद्ध दृष्टि से, कब तक सुभाष बच सकते थे
शासन की खोजी आखों से, कब तक सुभाष छिप सकते थेपड़ गयी बेड़ियाँ हाथों में, निज घर में बंदी बन बैठे
ब्रिटिश फौज़ के घेरे में, सन्यासी का रूप धरेवह शेर नहीं था जंगल का, जो लौह सींखचों में रहता
वह तो ऐसा अंगारा था, जो नीचे राख नहीं दबताब्रिटिश कैद से निकल पड़े, सब तोड़ गुलामी के बंधन
आज़ादी के हवन कुंड में, चल पड़े जलाने अपना तनसिंगापुर रंगून पहुँच, “आज़ाद हिन्द” का गठन किया
खून के बदले आज़ादी, जन जन को आवाज़ दियाबन गये सिपाही लाखों जन, लाखों ने धन का दान किया
मातृभूमि के चरणों में, लाखों ने जीवनदान दियासिंगापुर, इटली जापान गये, हिन्दुस्तानी मित्रों से मिलने
नापाक ब्रिटिश शासन विरुद्ध, हथियार समर्थन धन लेनेहथियार समर्थन धन लेकर, सेना का विस्तार किया
ब्रिटिश दैत्य से भिड़ने को, “आज़ाद हिन्द” तैयार हुआहे वीर पुत्र भारत माँ के, आज़ादी तुम्हें पुकार रही है
हिम आलय है बाट देखता, दिल्ली तुम्हें निहार रही हैगूंज उठा जय हिन्द हिन्द, सर कफ़न बाँध फौजी निकले
ब्रिटिश हुकुमत थर्रायी, जब आज़ाद हिन्द पलटन निकलेअंडमान निकोबार द्वीप, “काला पानी” कहलाते थे
आज़ादी के दीवानों के, बंदीगृह समझे जाते थेविहँस पड़ी उस समय भूमि, जब झंडा सुभाष ने फ़हराया
रो पड़ा सिंह समकक्ष देख, बंदी वीरों की कृष कायाब्रिटिश दासता के प्रतीक, उन द्वीपों के नव नाम दिये
आज़ादी पा जो हर्षित थे, ‘स्वराज्य’ ‘शहीद’ वे कहलायेनागालैंड तरफ बढ़ गया वीर, सदियों से दास बना जो था
आज़ाद हिन्द गोरी फौजों का, वह प्रांत बना रणस्थल थाललकार उठा वह मस्त सिंह, वीरों जय शीश मांगती है
देखो आज़ादी प्यासी है, वह खून खून चिल्लाती हैबढ़ गए वीर तन मोह छोड़, छोड़े प्रिय जन घर माया
कुर्बान हुये जननी खातिर, संपूर्ण जगत में यश छायावह महायुद्ध की बेला थी, हो गया पराजित जर्मन था
इटली जापान मर चुके थे, विजयी इंग्लैंड मुदित मन थाहाथ दाहिना टूट गया, जब हार गये जापानी
अभाग्य देश का सचमुच था, जय ‘आज़ाद हिन्द’ को मिली नहींजन जन के नेता गाँधी यदि, असहयोग क्रांति को फैलाते
वीरवर सुभाष के युद्ध यज्ञ में, थोड़ा भी खून गिरा पातेउस समय अन्य स्थिति होती, आज़ाद देश हो सकता था
सदियों से बना गुलाम देश, आज़ाद हवा ले सकता थाहार गया आज़ाद हिन्द, भाग्य देश अपना हारा
सो गया देश का पारसमणि , जो बना देश का प्यारा थाबुझ गयी विश्वयुद्ध कि लपटें, नव निर्माणों की बेला थी
पर भारत में सत्य अहिंसा, क्रांति युद्ध की बेला थीइस नयी क्रांति की ज्वाला को, रे कौन बुझा सकता था
सदियों से सोयी जाति जगी, रे कौन कुचल सकता थाथका हुआ बूढा ब्रिटेन, कमजोर शक्ति से हीन बना
अमरीका कम्युनिस्ट रूस, दो नयी शक्ति से दीन बनागोलमेज़ कांफ्रेंस चला, आज़ादी की बात चली
दिन गुजरे हफ्तों गुजरे, पश्चात देश की भाग्य जगीब्रिटेन उस समय शासित था, लेबर के लार्ड ऐटली से
कुछ सहानुभूति जो रखता था, गुलाम देश व दलितों सेआज़ादी से वंचित रखना, ब्रिटेन के वश की बात न थी
पर हिन्दू मुस्लिम भाई भाई, में नफरत की बीजें बोयीजिन्ना साहब मुस्लिम लीगी, आज़ादी के इक नायक थे
अंग्रेजी शासन के खिलाफ, इंसान सही माने में थेब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, स्वयं जिन्ना साहब फंस बैठे
मजहब धर्म की आंधी में, दो देश समर्थक बन बैठेहिन्दू मुस्लिम में आग लगी, बन गये खून के प्यासे थे
जो कल तक भाई होते थे, बन गये आज दुश्मन पक्केहर साल रंग की होली थी, इस साल खून से हम खेले
हर साल प्यार की खुशबू थी, इस साल घृणा के मेले थेआज़ादी की या सत्ता की, नेताओं में जो जल्दी थी
ब्रिटिश कूटनीति के फंदे में, फंसने की उनको जल्दी थीसब शर्त मान अंग्रजों का, आज़ादी हमने हासिल की
जो भूमि गुलामी में जुड़ी रही, वह आज़ादी में टूट गयीसैंतालिस का पन्द्रह अगस्त, खुशियों का सागर लाया
एक तरफ हजारों जीवन में, दुःख का मातम छायालाखों हज़ार घर उजड़ गये, चहुँ ओर भीड़ थी दुखियों की
जन जन के प्रिय गाँधी के लिए, वह समय नहीं था खुशियों कीजिन आदर्शो के खातिर, जीवन भर संग्राम किया
दब गये घृणा आंसू नीचे, सब बापू का अरमान मिटा -
हैरानी सारी हमें ही होनी थी – बृजमोहन स्वामी की घातक कविता।
हैरानी कुछ यूँ हुई
कि उन्होंने हमें सर खुजाने का
वक़्त भी नही दिया,
जबकि वक़्त उनकी मुट्ठियों में भी नही देखा गया,
लब पर जलती हुई
सारी बात हमने फूँक दी
सिवाय इस सिद्धांत के
कि हमने सपनों की तरह
आदमी देखे,
जबकि ‘सपने’ किसी गर्भाशय में पल रहे होते तो
सारे अल्ट्रासाउंड
घड़ियों की तरह बिकते
और हम वक़्त देखने के लिए सर फोड़ते,
मेहँदी की तरह लांछन लगाते,
सिगरेटों की तरह घर फूंकते,
कुत्तों की तरह बच्चे पालते,
रक्तदान की तरह सुझाव देते,
एक हाथ से ताली बजाते,
औरतें चूड़ियों में छुपाती ‘सुहाग’
आदमी बटुओं में ‘सुहागरात’ छुपाते
और भाट पूरी रात गाते विरुदावलियाँसच बताऊँ तो हुआ यूँ था कि
जब हमने आज़ादी के लिए आवाज़ उठाई
तो हमारी अंगुलियां बर्फ की तरह जमी हुई मिली, हमारे गलों में
और हमने तकलीफों को
मुद्दों की तरह उठाया
जबकि ‘रोना’ कॉलेजों के शौचालयों में ही घुटाकर मरा
बाहर हमारे बनाये पोस्टर दम तोड़ते गए।हमने हयात फूंकने की ज़हमत उठाई
और हड्डियों के बुरादे को
रोटियों में मिलाकर खाया
ताकि एक पीढ़ी बचा सकें।प्यार के दरवाज़े हमारे लिए सिर्फ
स्कूलों की उबासियों में टिफिन की तरह ही खुलते थे
और चीन के साथ लड़ाई की
खबरों के साथ हमने नींद के केप्सूल खाये,
जबकि बीच रात पालने में खेलते
हमारे छोटे बहन-भाइयो का बदन
दैनिक जागरण और भास्कर नामक अखबारों से पोंछा जाता रहा
उनमे इसी दुनियां के लोगों के मौत की खबरे थी
हमने बिस्तरों की चादरें खींच कर
अपने बदन और चेहरे को ढक लिया था
समझदार प्रेमिकाओं की तरह।अपनी महानता के नियमों में
मुहल्लेदारी से रिश्तेदारी तक
सान्त्वना देने के बहाने
हमने धरती रोककर
उनका मांस सहलाया,
पावरोटी सी फूली बाजुएँ लिए फिरे,
‘गूँगी चीखों’ को जन्म दिया गया,
आपत्तिजनक टिप्पणियाँ
कागजों में ही सोई रही।संयोग से
आदमी ही हथियार बनाया गया
नौकरी सिर्फ विज्ञापनों में रही,
क्रन्तिकारी तस्वीरों में चले गए,
अंगूरों पर मौत लिखी गई,
टीवी, रेडियो और मोबाइलों पर जिंदगीअब जाकर नशा टूटा
आज़ादी का असली मतलब देखा
हमने उन्ही रास्तों में पिरोये दस्तखत
उन्हीं सपनों को जिया
जो हमारे सर काटना चाहते थे
जबकि रेलगाड़ियों के आगे कटकर मरना सस्ता था।सबकुछ छीनने के बाद भी
उन्हीं सांसों में सहारा लिया गया
जो सिर्फ ‘सांसें’ थी
और गुनाह सिर्फ इतना था
की हमने
घटनाओं का विरोध करना अपने बच्चों को सौंपा !!बेज़ुबां दास्ताँ ये…
कितने दर्द छुपाएगी?© copyright Brijmohan Swami

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उम्र की पतंगें !
कविताउम्र की पतंगें: अनुपम त्रिपाठीवे, बच्चे !बड़े उल्हास सेचहकते—मचलते; पतंग उड़ाते…………. अचानक थम गए !!उदास मन लिएलौट चले घर को———— पतंग छूट जाने से———— डोर टू…ट जाने सेक्या, वे जान सकेंगे ?कभी कि; ————हम भी बिखेरा करते थे, मुसकानें यूं ही: चढ़ती उम्र के; बे—पनाह जोश में .मगर;——-गुमसुम हैं, आज !समय की रंगीन—अमूल्य पतंग; छूट जाने परअभिलाषा के अंत—हीन आकाश में ———–—————–उम्मीद की डोर; टू…ट जाने पर .‘वे’, तो खरीद लायेंगेकल फिर,कई उमंगें—–नई पतंगेंपर, क्या करें “हम” ????******______******#anupamtripathi #anupamtripathiK -

बच्चे हम फूटपाथ के
बच्चे हम फूटपाथ के,
दो रोटी के वास्ते,
ईटे -पत्थर तलाशते,
तन उघरा मन बिखरा है,
बचपन अपना उजड़ा है,
खेल-खिलौने हैं हमसे दूर,
भोला-भाला बचपन अपना,
मेहनत-मजदूरी करने को है मजबूर
मिठई, आईसक्रीम और गुबबारे,
लगते बहुत लुभावने ,
पर बच्चे हम फूटपाथ के,
ये चीजें नहीं हमारे वास्ते,
मन हमारा मानव का है,
पर पशुओं सा हम उसे पालते,
कूड़ा-करकट के बीच,
कोई मीठी गोली तलाशते,
सर्दी-गर्मी और बरसात,
करते हम पर हैं वर्जपात,
पग -पग काँटे हैं चुभते,
हम फिर भी हैं हँसते,
पेट जब भर जाए कभी,
उसी दिन त्योहार है समझते,
दो रोटी के वास्ते पल-पल जीते -मरते,
बच्चे हम फूटपाथ के ।।
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बचपन गरीब
यूँ तो हर रोज गुजर जाते हैं कितने ही लोग करीब से,
पर नज़र ही नहीँ मिलाते कोई इस बचपन गरीब से,
रखते हैं ढककर वो जो पुतले भी अपनी दुकानों में,
वो देखकर भी नहीं उढ़ाते एक कतरन भी किसी गरीब पे,
बचाते तो अक्सर दिख जाते हैं दो पैसे फकीर से,
पर लगाते नहीं मुँह को दो रोटी भी किसी बच्चे गरीब के॥
राही (अंजाना) -
भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।
भूखे थे बच्चे दो दिनों से नींद कैसे आती।
माँ के पास कहानियों के सिवा कुछ न था।
@@@@RK@@@@ -
बाल श्रमिक
मंदिर में पानी भरती वह बच्ची
चूल्हे चौके में छुकती छुटकी
भट्टी में रोटी सा तपता रामू
ढावे पर चाय-चाय की आवाज लगाता गुमशुदा श्यामू रिक्से पर बेबसी का बोझ ढोता चवन्नी फैक्ट्रीयों की खड़खड़ में पिसता अठन्नी
सड़कों,स्टेशनों,बसस्टॉपों पर भीख माँगते बच्चे भूखे अधनंगे
कचरे में धूँढते नन्हे हाथ किस्मत के टुकड़े
खो गया कमाई में पत्थर घिसने वाला छोटे
किसी तिराहे चौराहे पर बनाता सिलता सबके टूटे चप्पल जूते।
दीवार की ओट से खड़ी वो उदासी
है बेबस, है लाचार इन मासूमों की मायूसी
दिनरात की मजदूरी है मजबूरी
फिर भी है भूखा वह, भूखे माँ-बाप और बहन उसकी।
कुछ ऐसा था आलम उस पुताई वाले का
पोतता था घर भूख से बिलखता।
कुछ माँगने पर फूफा से मिलती थी मार लताड़।
इसी तरह बेबस शोषित हो रहे हैं
कितने ही बच्चे बार-बार।
न इनकी चीखें सुन रहा, न नम आँखें देख रहा
वक्त, समाज, सरकार!!!
होना था छात्र, होता बस्ता हाथ में,
इनका बचपन भी खेलता,
साथियों व खिलौनों के साथ में।
पर जकड़ा !!
गरीबी,मजदूरी,भुखमरी और बेबसी ने इनके बचपन को!
शर्मिंदा कर रही इनकी मासूमियत समाज की मानवता को।
दी सरकार ने…
जो स्कूलों में निशुल्क भोजन पढाई की व्यवस्था
पेट भरते है उससे अधिकारि ही ज्यादा।
फिर क्या मिला ?
इन्हें इस समाज से
बना दिया सरकार ने..
बस एक ” बाल श्रमिक दिवस”इनके नाम से।
** ” पारुल शर्मा ” ** -
माँ
अहसास प्यार का माँ के, माँ की यादें, माँ का साथ।
गज़ब सुकूँ मिलता है, जब माँ सर पर फेरे हाथ॥
माँ के हाँथ की थपकी, माँ का प्यार, वो माँ की ममता।
बच्चे को भोजन देकर भूखे सोने की क्षमता॥
माँ ही सृष्टि रचयिता, शिशु की माँ ही रचनाकार है।
प्रेम, भक्ति और ज्ञान सभी से बढ़कर माँ का प्यार है॥
बिन माँ सृष्टि अकल्पित नामुमकिन इसका चल पाना है।
शब्दों में नामुमकिन माँ को अभिव्यक्ति दे पाना है।
________________
शिवकेश द्विवेदी
-
किताब ज़ार ज़ार रोई
किताबे भी दर्द मे रोती हैं
सिसकती हैं ,लहू लहान
तेरे दर्द में होती हैं
************
वो चंद घंटे पहले शहर
में उतरा ,शहर
की कुछ गलियो मे घूमा
सड़को को देखा ,जन्नत
घूमा,रंग बिरंगे फूल
खुशियाँ ही खुशियाँअचानक मोड़ पर मुड़ते ही
टूटे सपनो की बस्ती,
पेट की आग
रोटी का तमाशा
सकंरी गलियाँ,
धूप की आग में लिपटा
मन,टिन टपड़ की छत
और छत के अन्दर
बिखरे वजूद,कच्चा फर्श
कॉच की बोतल,रेंगता
दिल,दो बटन के
बीच से झाकँता जिस्म,
और उस पर टिकी चील
की आँखेन जाने किन गुनाहो
कि सजा काटता शहर,
घूप अन्धेरा,टूटे मन से
गली मे घुसता सूरज
अंधी गली,अंधा शहरपर फिर भी कहीं
आखरी नुक्कड़ पर भूखे
बच्चे कन्चो पर निशान
साध,भविष्य को लूटने
की साजिश रचते
†*******
किताब ज़ार ज़ार रोई ये किस्सा बताकर -

मैं बच्चा बन जाता हूँ
कविता … “मैं बच्चा बन जाता हूँ”
न बली किसी की चढ़ाता हूँ।
न कुर्बानी से हाथ रंगाता हूँ।
रोने की जब दौड़ लगती है,
मैं गिद्धों पर आंसू बहाता हूँ।
न मैं मंदिर में जाता हूँ।
न मस्जिद से टकराता हूँ।
ईश्वर मिलने की चाहत में,
मैं विद्यालय पहुँच जाता हूँ।छोटे-छोटे कृष्ण, सुदामा,
पैगम्बर, बुद्ध मिल जाते हैं।
हमसे तो बच्चे ही अच्छे,
जो एक ही थाली में खाते हैं।
जाति, धर्म का ज्ञान नहीं
बच्चे मन के सच्चे हैं।
सच्चा बनने की चाहत में,
मैं भी बच्चा बन जाता हूँ।
क्या आप बच्चा बनेंगे..?
ओमप्रकाश चन्देल ‘अवसर’
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़7693919758
-

जब हम बच्चे थे
जब हम बच्चे थे ,
चाहत थी की बड़े हो जायें |
अब लगता है ,
कि बच्चे ही अच्छे थे ||
अब न तो हममें कोई सच्चाई है ,
न ही सराफ़त ,
पर बचपन मे हम कितने सच्चे थे |
जब हम बच्चे थे ||
अब न तो गर्मी कि छुट्टी है ,
न ही मामा के घर जाना ,
माँ का आँचल भी छूट चुका है ,
पापा से नाता टूट चुका है ,
पहले सारे रिस्ते कितने सच्चे थे |
जब हम बच्चे थे||
न तो कोई चिंता थी ,
बीबी बच्चे और पेट की,
न ही कोई कर्ज़,
बैंक ,एलआईसी या सेठ की ,
सिर्फ़ और सिर्फ़ ,
हर दिन अच्छे थे |
जब हम बच्चे थे ||ओमप्रकाश चंदेल”अवसर”
पाटन दुर्ग छत्तीसगढ़
7693919758
-
दरके आइनों को
दरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत हैफासले वस्ल के यू सायें से बढ़े जाते है
ये कोई मिलना या तुम्हारी रुखसत हैहरसूँ बिखर गए तेरे पन्नें नसीब के
अब तो खाली जिल्द की हसरत हैवक़्त रूठा किसी बच्चे की माफिक
जिसकी जिद है या कोई शरारत हैअब किस और जहान जाएँ’अरमान’
जिस तरफ देखिये बस नफरत हैदरके आइनों को नाज़ुकी की जरूरत है
गर आ जाएँ इल्ज़ाम यही तो उल्फत हैराजेश’अरमान’
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” बच्चे और सपने “
सपनों में बच्चे देखना
सुखद हो सकता है ;
लेकिन ; बच्चों में
सपने देखना आपकी भूल हैजैसे; सपने…… सिर्फ़ सपने
बच्चे : साकार नहीं करते
वैसे ही; बच्चों में सपने
साकार करना फिजूल है.हाँ ! आप ऐसा करिए;
बच्चों में सपने रोपिए
शिक्षा और संस्कार
कदापि न थोपिए .आपके सपने —————
चाहे जितने रंगीन हों
आपकी विफलता की कहानी हैंबच्चों की उडान
उनकी सफलता की निशानी हैं.आप बच्चों को उड़ने दीजिए
खुले आकाश में——–
तेज हवा और तीखी धूप के बीच
बिन्दास–बेखौफ़– बेतहाशाबस; डोर उतनी ही खींचिऐ
कि; पतंग……..पथ से भटके नहीं
पेडों की फुनगियों— बिजली की तारों
और भवन— छज्जों पर अटके नहीं.*******——–*********———*****
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“वे”
आकाश से आती हैं जेसे ठंडी ठंडी ओस की बुंदे।
नन्हे नन्हे बच्चे आते हैं आँखे मूंदे।।
इन बूंदों को सँभालने वाली वो कोमल से पत्तियां।
बन जाती है नजाने क्यों जीवन की आपत्तियां।।
गोद में जिनकी किया इस जीवन का आगाज़ ।
लगती है नजाने क्यों कर्कश उनकी आवाज़।।
दुःख हमारे उनके आंसू,ख़ुशी हमारी उनके चेहरे की मुस्कान।
करते नही नजाने क्यों उनका ही सम्मान।।
हमें खिलाया फिर खाया हमे सुलाकर सोय थे।
खुद की उन्हें फिकर कहा थी वो तो हम में ही खोय थे।।
पता नहीं कुछ लोग किस भ्रम् में रहते हैं।
जिनके सर पर बेठे है उन्हें ही बोझ कहते हैं।।
अरे नासमझ समझदारों बिना किराय के किरायेदारों।
नीचले क्रम की ऊँची सोच वालों मुफ़्त सुविधाओं के खरीदारों।।
ओस पत्ति को ठंडक पहुंचती है न की उसपर अपना अधिकार जताती है।
पत्ति पे बने रहकर ही बूँद अपना अस्तित्व बनती है।
नीचे जो गिर गई तो मिट्टी में मिल जाती है।।
उनका दिल जो झुक गया तो उसका दिल भी दुखता है।
और उसका दिल जो दुःख गया तो पतन फिर न रुकता है।।
उन्हें कर के,खुद चैन से बेठे हो।
ह्रदय को अपने पाषाण बनाय बेठे हो।।
हम लोगों को पोषित किया,सब कुछ उनका गया फिज़ूल।
उनके दिए संस्कारों को हम गये भूल।।
गणेश जी के वो तीन चक्कर याद दिलाते हैं।
तीनो लोक उनके चरणों में आते हैं।।
जो अपने कर्मो से तुम उन्हें खुश कर पाय।
समझ लो के पूरा संसार जीत लाय।।
अपने माता पिता का सम्मान करें वही मनुष्य का प्रथम और परम कर्त्तव्य हैं।
प्रद्युम्न चौरे?
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माँ
आँखे तुझ पर थम गई जब तुझको बहते देखा।
सोच तुझमे रम गई जब तुझको सेहते देखा ।।
अपनी कलकल लहरों से तूने प्रकृति को संवरा है।
सबको शरण में लेती माँ तू तेरा ह्रदय किनारा है।।
हमे तू नजाने कितनी अनमोल चीज़े देती है ।
और बदले में हमसे कूड़ा करकट लेती है।।
खुद बच्चे बन गए,तुझको माँ कह दिया।
तूने भी बिन कुछ कहे हर दर्द को सेह लिया ।।
तेरे जल में कितने जलचर जलमग्न ही रहते है।
और कर्मकाण्ड के हथियारो से जल में ही जलते रहते हैं।।
पहले तुझमे झांक कर लोग खुद को देख जाते थे।
मन और मुँह की प्यास बुझाने तेरे दर पर आते थे।।
मगर आज जब में पास तेरे आता हूँ।
मन विचलित हो उठता है जब खुद को काला पता हूँ।।
तू रोती भी होगी तो हम देख न पाते हैं।
क्योंकि तेरे आंसू तुझसे निकलकर तुझमे ही मिल जाते हैं।।
इतना सब सहकर भी तूने हमे अपनाया है।
और इसीलिए ही शायद तूने माँ का दरजा पाया है।।
ये फूल ये मालायें सब दिखावे का सम्मान है।
हमे माफ़ कर देना माँ हम नासमझ नादान हैं।।
तू जो चली गई तो तुझे ढूंढेंगे कहाँ।
हमे छोड़कर हमसे दूर कभी न जाना माँ।।
Save our lifelines
Save our rivers…..
??????????Pradumnrc?
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गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….
गमछे रखकर के अपने कन्धों पर….
गमछे रखकर के अपने कन्धों पर
बच्चे निकले हैं अपने धन्धों पर।हर जगह पैसे की खातिर है गिरें
क्या तरस खाएं ऐसे अन्धों पर।सारा दिन नेतागिरी खूब करी
और घर चलता रहा चन्दों पर।अपना ईमान तक उतार आये
शर्म आती है ऐसे नंगों पर।जितने अच्छे थे वो बुरे निकले
कैसे उंगली उठाएं गन्दों पर।जिन्दगी कटती रही, छिलती रही
अपनी मजबूरियों के रन्दों पर।
……..सतीश कसेरा -

ठिठुरता बचपन (October 17: Anti Poverty Day)
October 17: Anti Poverty Day
सर्दी में नंगे पांव
कूड़ा बटोरते बच्चे
ठिठुरता बचपन उनका
सिकुडी हुई नन्ही काया
टाट के थैले की तरह
उनके रूदन का
क्या जिक्र करू मैं
लफ़्जों के कुछ दायरे होते है
नहीं फैल सकते वह
उनके रूदन की तरह