घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं….

घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं…..

घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं
बहुत से काम उजाले में नहीं होते हैं।

उडऩा चाहेंगे जो पत्ते, वे झड़ ही जायेंगे
वे आंधियों के तो मोहताज नहीं होते हैं।

कूदती-फांदती लड़की को सीढिय़ां तरसें
छत पे जब कपड़े नहीं सूख रहे होते हैं।

डूबती कश्तियों को देख कर भी हंस देंगे
बच्चे कागज से यूं ही खेल रहे होते हैं।

हादसा, जैसे सड़क पर कोई तमाशा हो
लोग बस रुक के जरा देख रहे होते हैं।

उसके जलने की सी उम्मीद लिये आंखों में
बच्चे चूल्हे के आसपास पड़े रहते हैं।

ऐसे आकर के नहीं घौंसला बना लेते
परिन्दे उड़ते में घर देख रहे होते हैं।

वो अपने जिस्म से हर रात निकल जाती है
जानवर लाश को बस नौच रहे होते हैं।
 …सतीश कसेरा

Comments

2 responses to “घने अंधेरे भी बेहद जरुरी होते हैं….”

  1. Satish Pandey

    वाह वाह, बहुत खूब
    वो अपने जिस्म से हर रात निकल जाती है
    जानवर लाश को बस नौच रहे होते हैं।

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