मीच के आँखें रोते -रोते
खोज रहा हूँ होकर मौन।
मुझको रुलानेवाला जग में
छुपकर बैठा आखिर कौन?
नजर भला वो आए कैसे
घर में बैठा बनकर डाॅन ।।
घर में डाॅन
Comments
9 responses to “घर में डाॅन”
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जीवन के कठोर अनुभव और सच्चाई से लबरेज है यह कविता, बार बार पढ़ने और सोचने पर मजबूर कर रही है, आपकी लेखनी विलक्षण है, जन-भाषा का सुंदर प्रयोग है, बहुत सुंदर कविता।
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बहुत बहुत आभार सहित धन्यवाद
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Nice
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धन्यवाद
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बहुत सुंदर कविता है भाई जी। हृदय स्पर्शी रचना।
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शुक्रिया बहिन
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बहुत ही भावपूर्ण, सुन्दर अभिव्यक्ति
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Bahut khoob
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बहुत सुंदर प्रस्तुति
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