घिस-घिस

घिस-घिस कर चप्पल बना, जीवन का संघर्ष,
खींच रहा पीछे मुझे, कैसे हो उत्कर्ष,
कैसे हो उत्कर्ष, चुभ रहे कंटक पथ में,
तुझे कहाँ महसूस, बात तू बैठा रथ में,
कहे लेखनी चली, जिन्दगी यूँ ही पिस-पिस,
बेबसी-मजबूरी, में यह जा रही घिस घिस।

Comments

11 responses to “घिस-घिस”

  1. बहुत अच्छी रचना

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  2. बहुत उम्दा लेखन

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

  3. बहुत ही सुंदर लय और शिल्प

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

      1. Pragya Shukla

        Welcome

  4. Geeta kumari

    संघर्ष पर आधारित कवि सतीश जी की बहुत ही सुन्दर और श्रेष्ठ रचना छंद बद्ध शैली ने चार चांद लगा दिए हैं।

    1. Satish Pandey

      बहुत बहुत धन्यवाद

  5. संघर्ष ही जीवन है,ये बताती हुई बहुत सुंदर कविता

    1. Satish Pandey

      सादर धन्यवाद

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