घुट-घुट आँसू पीना है..

मुझको तो बस तन्हाई में ही जीना है
सिसक-सिसक कर रहना है
घुट-घुट आँसू पीना है
कोई ना समझा मेरी पीर को
तो तुम क्या समझोगे !
नहीं किया कभी प्यार किसी ने
तो तुम क्या मुझको दिल दोगे !
अब तो आदत हो चली पीर की
अब तो पीर में ही जीना है…
कोई ना समझा मेरी पीर को
घुट-घुट आँसू पीना है…
दिन हो मेरा रोते-रोते
रात कटे करवटें बदलते
मेरे नैना बरसें हर पल
इनका ना कोई महीना है
कोई ना समझा मेरी पीर को
घुट-घुट आँसू पीना है…

Comments

8 responses to “घुट-घुट आँसू पीना है..”

  1. Geeta kumari

    एक विरहणी के दर्द का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत करती हुई कवयित्री प्रज्ञा जी की हृदय स्पर्शी रचना ।अकेले पन के दर्द को बयां करती हुई मार्मिक अभिव्यक्ति

  2. SANDEEP KALA BANGOTHARI

    VERY VERY NICE

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