अच्छा तो तुम कल
छत पे आये थे !
पतंग को तंग करने या
मुझको हिय से लगाने आये थे ??
सच बताओ क्या आज भी करते हो हमसे प्यार!
या पड़ोसन को झांकने तुम छत पे आये थे।
सरसराती हवा ने तुम्हारे बालों में
की तो होंगी कंघियाँ,
पड़ी तो होंगी तुम्हारे गालों पर कुछ झीसियाँ ।
हम अछूते रह गए उस दृश्य से
उस कृत्य से
जब तुम्हें मेरी पड़ोसन देख रही होगी घूंघट की ओट से।।
घूंघट की ओट से…
Comments
2 responses to “घूंघट की ओट से…”
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बहुत ही सुन्दर भाव।
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Thanks
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