चल दिये क्यों फेर कर मुँह
राह में हम भी खड़े थे,
आपसे मिल लेंगे दो पल
चाह में हम भी खड़े थे।
मुस्कुराकर आपने
गैरों में खुशियों को लुटाया,
हम रहे तन्हा, गमों में
अश्रुपथ भीतर बनाया।
चल दिये क्यों फेर कर मुँह
Comments
16 responses to “चल दिये क्यों फेर कर मुँह”
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वाह, बहुत सुंदरता से अपने भावों को व्यक्त किया है।
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सादर धन्यवाद जी
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सुन्दर
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बहुत बहुत धन्यवाद
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सुन्दर प्रस्तुति
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सादर धन्यवाद सर
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Very nice
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Thank you
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वाह वाह
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Thank you शास्त्री जी
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सुन्दर अभिव्यक्ति
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सादर धन्यवाद है आपको
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Nice
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Thanks ji
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Sundar
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Thank you ji
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