हो चुकी है रात
चारों ओर छाया है अंधेरा
चाँद आया ही नहीं
तारों में छाई है उदासी।
टिमटिमा कर कह रहे हैं
किस तरह से अब कटेगी
रात तन्हाई भरी।
एक पखवाड़े की होगी
चाँद से अपनी जुदाई,
याद करके वह जुदाई
मन में सिहरन है भरी।
चाँद आया ही नहीं
Comments
8 responses to “चाँद आया ही नहीं”
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बहुत खूब
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सादर धन्यवाद शास्त्री जी
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प्राकृतिक दृश्य को कवि ने प्रेम से जोड़ कर बहुत ख़ूबसूरत चित्रण किया है । कविता की लयबद्ध शैली और सुंदर अभिव्यक्ति ,सतीश जी बहुत सुंदर रचना और उसकी सुंदर प्रस्तुति ।
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इस सुंदर और प्रेरणादायक समीक्षा हेतु बहुत बहुत धन्यवाद गीता जी। लेखनी को सैल्यूट
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लाजवाब
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बहुत बहुत धन्यवाद प्रज्ञा जी
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बहुत खूब बहुत सुंदर
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सादर धन्यवाद
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