चाँद

चाँद तुम रात भर
चले, चमके,
न जाने कब से
सिलसिला ये चला ।
अब तक चल रहा है,
चलते ही जा रहा है।
कोई जा रहा है,
कोई आ रहा है,
लेकिन तुम्हारा सिलसिला
चलता ही जा रहा है।
पूरब से पश्चिम
बिखराते रहे चाँदनी
उगते और अस्त होते रहे
आकार बढ़ता रहा
कम होता रहा,
सिलसिला चलता रहा,
मैं देखता रहा।
पूर्णिमा बना संसार को
प्रकाशित किया,
अमावस में छिप गए,
मिटने और उगने की
कथा लिख गए।

Comments

8 responses to “चाँद”

  1. कमाल की उच्चतम स्तर की

    1. बहुत बहुत धन्यवाद

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर भाव

    1. सादर धन्यवाद

  3. Praduman Amit

    बहुत ही सुन्दर।

    1. बहुत बहुत धन्यवाद जी

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