हमने बिछाई हैं
कई बार राह में पलकें
वो भी पलट के देखेगा
यह उम्मीद
नहीं रखती हूँ
जब से देखी है सनम की सूरत मैनें
तब से मैं
चाँद को चाँद नहीं कहती हूँ!!
चांद को चांद नहीं कहती हूं
Comments
4 responses to “चांद को चांद नहीं कहती हूं”
-
वाह बहुत खूब
-

बहुत उम्दा
-
जब से देखी है सनम की सूरत मैनें
तब से मैं
चाँद को चाँद नहीं कहती हूँ!!
वाह वाह, क्या बात है, बहुत खूब -
बहुत ख़ूब लिखा है
Leave a Reply
You must be logged in to post a comment.