ऐ चाँद भला क्यों इतरा रहे हो
जल्दी छत पर आओ ना।
भूखी-प्यासी प्यारी मेरी
कब से बाट निहारे आओ ना।।
कितनी सज-धज के आई
अब तो यूँ इतराओ ना।
जल भी है मिष्ठान्न भी है
फल फूलों का भोग लगाओ ना।।
चांद से
Comments
8 responses to “चांद से”
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वाह, भाई जी बहुत सुंदर कविता
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शुक्रिया बहिन
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लाजवाब✍ 👌👌
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धन्यवाद
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बहुत खूब
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धन्यवाद
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Wah
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