चाहत तुम में भी मुझ में भी

मैं भी साधारण मानव हूँ,
तुम भी साधारण मानव हो
कमियां तुम में भी मुझ में भी
आंसू तुम में भी मुझ में भी।
गलती तुम से भी हो जाती है
गलती मुझ से भी हो जाती है,
गलती अपनी गलती का
अहसास हमें करवाती है।
आ अब गलती की खोज नहीं
कमियों की कोई ढूंढ नहीं,
आ प्यार करें इक-दूजे से
चाहत तुम में भी मुझ में भी ।
—- Dr. satish Pandey

Comments

4 responses to “चाहत तुम में भी मुझ में भी”

  1. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    अतिसुंदर

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद जी

  2. मनुष्य की कमियों और अच्छाइयों को आत्मसात करती हुई रचना कवि की कोमल भावनाओं को प्रदर्शित कर रही है

    1. Satish Pandey

      धन्यवाद

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