छोड़ आए हैं वो नन्ना सा गांव साथियों
सर्दी की धूप पीपल की छांव साथियों
याद आता है मासूम सा वो बचपना मेरा
जिसे छोड़ आया था हसके आज खुद ही रो पड़ा
चार दीवारे मिल गई और छत भी मिल गया
अब तक नहीं मिला वो अपना घर नहीं मिला
बसी थी ममता जिसमें और माटी की गंध साथियों
सुकून देती हर फिज़ा वो माहौल साथियों
सुबह की ठंडी ओस और घटा घनघोर याद है
कुछ आशा और निराशा का मेल याद है
सजे थे सपने अनगिनत आकांक्षाएं बड़ी-बड़ी
शहर की घुटन में जाने कब टूट कर बिखर गई
लिए फिरता हूँ अब जीने की ऊब साथियों
जीने के लिए भूला हूं वो अपना गांव साथियों ।।

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