झूठी सीढ़ी मत बना, मंजिल चढ़ने हेतु,
खाली ऐसे बना मत तू कागज के सेतु,
तू कागज के सेतु, से स्वयं से मत कर छल,
ऐसे कैसे पार, होगा लक्ष्य का पथ कल,
कहे लेखनी आज जेब में रख सच बूटी,
बढ़ना है गर तुझे, छोड़ सब राहें झूठी।
छोड़ सब राहें झूठी
Comments
4 responses to “छोड़ सब राहें झूठी”
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तू कागज के सेतु, से स्वयं से मत कर छल,
ऐसे कैसे पार, होगा लक्ष्य का पथ कल,
*************बहुत सुंदर विचार प्रस्तुत करती हुई एक उच्च स्तरीय रचना, विद्यालय में भी शिक्षक विद्यार्थियों को यही समझाते हैं कि यदि आज नकल करोगे तो कल आगे नहीं बढ़ पाओगे। बहुत ख़ूब, श्रेष्ठ रचना लाजवाब प्रस्तुति -
वाह
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सभी के लिए सही बात ऐसा ही होना चाहिए
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वाह,बहुत खूब पाण्डेय जी
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