जज्बात

जिक्र ए जहन
किससे करें हम
लफ़्ज हैं दबे दिल में कहीं
शायद डर रहें हैं
बाहर निकलने से
कोई समझेगा या नहीं
क्या कहेगा कोई
इसी उधेड़बुन में
खोई रहती हूं अपने ख्यालों में
करती हूं इंतजार
उस पल का
जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
जहन की दीवारों को

Comments

12 responses to “जज्बात”

  1. मोहन सिंह मानुष Avatar
    मोहन सिंह मानुष

    बहुत ही बेहतरीन प्रस्तुति

  2. Pt, vinay shastri ‘vinaychand’

    बेहतरीन

  3. Geeta kumari

    Nice lines

  4. Satish Pandey

    “जब जज्बात तोड़ कर निकलेंगे
    जहन की दीवारों को” में अनुप्रास से अलंकृत कर मन में छिपे जज्बातों को पंक्तिबद्ध करने का सुन्दर प्रयास है. वाह

  5. गागर में सागर भर दिया है

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