जब तक मैं कंवारा था

जब तक मैं कंवारा था
मजाक और झूठ का अंतर नही समझ पाया
अब जानता हूँ सच तो लोग खुद से भी नही बोल पाते

जब तक मैं कंवारा था
किसी को दर्द में देख उदास हो जाता था
अब देखता हूं तेहरवीं का जश्न तो छटी से बड़ा होता है

जब तक मैं कंवारा था
मानता था मुझे कोई दर्द नही, मेरी माँ है तो
अब जानता हूँ कुछ दर्द किसी को बताए तक नही जाते

जब तक मैं कंवारा था
लगता था पापा कुछ भी ला सकते है,मेरी खुशी के लिये
अब लगता है बच्चों की खुशी की कीमत जिंदगी के बीस साल होती है

जब तक मैं कंवारा था
आंखों में हूरों के सपने तैरते थे
अब पहचान हुई उनके चेहरों के पीछे कितनी कालिख पुती होती है

जब तक मैं कंवारा था
मुझे बताया गया एक नौकरी और एक पत्नी काफी है
अब बताने से भी कतराता हूँ शर्माजी, वो सब एक गलतफहमी होती है

जब तक मैं कुंवारा था
मुझे कुंवारेपन से चिढ़ सी होती थी
अब चाहता हूँ ताउम्र उसी में गुजरती तो अच्छा होता

Comments

13 responses to “जब तक मैं कंवारा था”

  1. Geeta kumari

    बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

    1. pravin

      आभार

    1. pravin

      thanx neha

  2. वाह वाह क्या बात है 

    1. pravin

      धन्यवाद जी

  3. यथार्थ चित्रण किया है आपने

    1. pravin

      शुक्रिया जी

  4. उत्तम सृजन

    1. pravin

      आभार पांडे जी

  5. क्या बात है बहुत खूबसूरत 

    1. pravin

      शुक्रिया प्रज्ञा जी

      1. वेलकम 

Leave a Reply

New Report

Close